जंतर-मंतर का घटनाक्रम : जेन-ज़ी के उभार से कहीं अधिक

The Jantar Mantar Incident: Far More Than the Rise of Gen Z

Oct 12, 2026 - 21:18
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जंतर-मंतर का घटनाक्रम : जेन-ज़ी के उभार से कहीं अधिक

प्रो. प्रदीप माथुर

वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विशेषज्ञ

युवाओं में क्रांतिकारी उत्साह का अचानक फूट पड़ना सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान और विपक्ष, दोनों के लिए अप्रत्याशित रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनमत निर्माता होने का दावा करने वाले बुद्धिजीवियों के पास भी इस घटनाक्रम की उत्पत्ति का कोई ठोस जवाब दिखाई नहीं देता। इस पर किसी गंभीर मनो-सामाजिक अध्ययन के अभाव में इसे सुविधानुसार एक प्रचलित शब्द—‘जेन-ज़ी’—से जोड़कर देखा जा रहा है।

लेकिन जेन-ज़ी तो पहले भी मौजूद थी। असली सवाल यह है कि यह आक्रोश अब क्यों फूटा है?

जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन को करीब से देखने वाले समझते हैं कि केवल किसी एक शब्द के इस्तेमाल या किसी छिटपुट घटना से इतना व्यापक, तीव्र और टिकाऊ जनांदोलन खड़ा नहीं हो सकता। इसके पीछे निश्चित रूप से कुछ गहरे कारण हैं। महँगाई, बेरोजगारी और परीक्षाओं में अनियमितताओं ने इस आक्रोश को हवा दी है, लेकिन इनमें से कोई समस्या नई नहीं है। ये वर्षों से मौजूद हैं। फिर अचानक इनमें इतनी विस्फोटक शक्ति कहाँ से आ गई?

इस आंदोलन के पीछे कुछ और भी है, जिसने इसे स्वतंत्र भारत में देखे गए अनेक जनांदोलनों की तुलना में व्यापकता, तीव्रता और टिकाऊपन के मामले में आगे ला खड़ा किया है। यहाँ तक कि अत्यंत सम्मानित जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974-75 में चला आंदोलन भी वैसा स्वरूप और गति हासिल नहीं कर पाया, जैसी जंतर-मंतर के आंदोलन ने अब तक प्रदर्शित की है।

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*जंतर-मंतर के आंदोलन को जेन-ज़ी का स्वतःस्फूर्त आक्रोश मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। इसे आदर्शवाद, सामाजिक चेतना और समतामूलक आकांक्षाओं के गहरे पुनर्जागरण के रूप में समझने की जरूरत है।*

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इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यवस्था में व्याप्त ठहराव और निराशा ने इस आंदोलन को जन्म दिया है। लेकिन यह ठहराव केवल आर्थिक या भौतिक नहीं है; यह वैचारिक भी है।

इस बात का एहसास मुझे अपने परिवार की एक घटना से हुआ। 1990 के दशक के आरंभ में मेरा एक चचेरा भाई, जो मुझसे लगभग 25 वर्ष छोटा था, बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान फैले मुस्लिम-विरोधी प्रचार से प्रभावित होकर अपने मुस्लिम-विरोधी विचार व्यक्त करने लगा। मैंने उसका विरोध किया और उसे याद दिलाया कि हमारा पारिवारिक संस्कार धर्मनिरपेक्षता का रहा है। हमारे वकील दादा के मुंशी एक मुसलमान थे, जिनका पूरा परिवार बड़े-बुजुर्ग की तरह सम्मान करता था। वे भी हम सबको अपने बच्चों की तरह मानते थे।

मेरी बात सुनकर मेरा ममेरा भाई आहत हुआ और चुप हो गया, लेकिन वह अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं था।

मैं सोचने लगा कि एक अत्यंत शिक्षित, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील परिवार का युवक सांप्रदायिक मानसिकता कैसे अपना सकता है। इस सवाल ने मुझे अपनी युवावस्था की ओर लौटकर देखने के लिए प्रेरित किया। मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी लगभग ऐसी ही थी। मैंने उस दौर में आँखें खोली थीं, जब विभाजन की हिंसा की स्मृतियाँ ताजा थीं और सांप्रदायिक अत्याचारों की कहानियाँ आम थीं।

लेकिन मेरी सोच को दिशा देने वाली कोई दूसरी शक्ति थी।

करियर बनाने की इच्छा के साथ-साथ मैं समानता, न्याय और निष्पक्षता पर आधारित समतामूलक समाज की मार्क्सवादी अवधारणाओं से गहराई से प्रभावित था। समाजवाद मेरे लिए मार्गदर्शक विचार बन गया। निस्संदेह, वह एक सपना था, बल्कि कहें तो आदर्शलोक की कल्पना; लेकिन वह ऐसा प्रेरणादायी सपना था, जिसने युवाओं को अपने निजी हितों से ऊपर उठकर किसी बड़े उद्देश्य में विश्वास करने और उसके लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

जब मेरे  भाई की पीढ़ी युवावस्था में पहुँची, तब तक वह सपना सार्वजनिक विमर्श से लगभग गायब हो चुका था। उसकी जगह दूसरे विचार ने पहचान और उद्देश्य का विकल्प प्रस्तुत किया। मेरे भाई के लिए हिंदुत्व ही मार्गदर्शक विचार बन गया, हालाँकि इसके आकर्षण के साथ मुसलमानों के प्रति शत्रुता और भारत में मुस्लिम शासन को लेकर एक काल्पनिक शिकायत भी जुड़ी हुई थी। यह सब अक्सर इतिहास की सार्थक समझ के बिना हो रहा था।

हर युवा पीढ़ी को आगे बढ़ने के लिए किसी आदर्श, प्रतीक या विचार की जरूरत होती है।

1980 और 1990 के दशक में युवावस्था में प्रवेश करने वाली पीढ़ी को इसका उत्तर उदारीकरण और वैश्वीकरण में मिला। अब सपना समाजवाद नहीं, बल्कि समृद्धि था—अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी, अपनी कार, आरामदायक घर और बेहतर जीवन-स्तर। बाजार की संभावनाएँ ही नई आकांक्षाओं का आधार बन गईं।

इसके बाद की पीढ़ी संचार और सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति से प्रभावित हुई। इंटरनेट, कंप्यूटर और मोबाइल फोन उसके जीवन की पहचान बन गए। मोबाइल तकनीक तेजी से बदली—साधारण फोन से संदेश भेजने वाले उपकरणों तक और फिर इंटरनेट से जुड़े शक्तिशाली स्मार्टफोन तक। तकनीक ही उसका नया आराध्य बन गई।

लेकिन उदारीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति, दोनों की एक बड़ी सीमा थी। इनका मूल स्वभाव व्यक्तिवादी था। इन्होंने व्यक्तिगत उन्नति के लिए अपार अवसर तो दिए, लेकिन समूचे समाज के बारे में सोचने की प्रेरणा बहुत कम दी। इनसे भौतिक आकांक्षाएँ पूरी हो सकती थीं, अभूतपूर्व संपर्क-सुविधाएँ मिल सकती थीं और व्यक्तिगत जीवन बदल सकता था; लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी के सवाल इनके केंद्र में नहीं थे।

कहावत है कि मनुष्य केवल रोटी के सहारे नहीं जीता।

आज के युवाओं की भौतिक जरूरतें पहले की तुलना में बेहतर ढंग से पूरी हो रही हैं और इंटरनेट की पूरी दुनिया उनके हाथों में है। इसके बावजूद वे उपभोग और व्यक्तिगत सफलता से आगे कुछ तलाशते दिखाई देते हैं। उन्हें अपने माता-पिता से काफी हद तक राजनीति से दूर रहने वाली जीवनशैली विरासत में मिली है, लेकिन अब वे इसकी सीमाओं को भी समझने लगे हैं। उनके पास पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक साधन, अधिक जानकारी और अधिक अवसर हैं, फिर भी अनेक युवाओं को लगता है कि उनके जीवन में कुछ बुनियादी चीज की कमी है—एक सामाजिक उद्देश्य की भावना।

वे जिस चीज को फिर से खोज रहे हैं, वह है *सामाजिक विवेक और सामाजिक सरोकार।*

मेरे विचार में जंतर-मंतर के घटनाक्रम का गहरा अर्थ यही है।

इसलिए इसे जेन-ज़ी के अस्थायी उभार के रूप में खारिज नहीं किया जाना चाहिए। न ही इसे केवल किसी एक परीक्षा, सरकार के एक फैसले या किसी एक राजनीतिक विवाद से उपजे गुस्से तक सीमित कर देना उचित होगा। कम-से-कम आंशिक रूप से यह मानवीय संवेदना और कमजोर तथा वंचित लोगों के प्रति चिंता की भावना के पुनर्जागरण का संकेत है। यह वही भावना है, जो दशकों तक धन, करियर की अंधी दौड़ और व्यक्तिगत सफलता के दबावों के नीचे दबी रही।

दिलचस्प बात यह है कि इस आंदोलन में शामिल होने वाले या इसका समर्थन करने वाले अनेक युवा स्वयं समाज के आर्थिक रूप से वंचित वर्गों से नहीं आते। वे जरूरी नहीं कि गरीबी या अभाव के प्रत्यक्ष शिकार हों। फिर भी उनका सामाजिक विवेक उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित कर रहा है। वे उन लोगों के लिए अपना आराम, करियर और सुरक्षा तक दाँव पर लगाने को तैयार हैं, जिनके पास उनसे कम साधन हैं।

यही बात इस घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बनाती है।

यह मान लेना गंभीर भूल होगी कि जंतर-मंतर का आंदोलन भावनाओं की ऐसी अस्थायी लहर है, जो जल्द ही शांत हो जाएगी। यदि इसके पीछे काम कर रही प्रेरणाओं को सही ढंग से समझा जाए, तो यह युवाओं में समाजवादी और समतामूलक सोच के नए स्वरूप के उभरने का संकेत हो सकता है—ऐसा स्वरूप, जिसे पुराने नामों, नारों या संगठनात्मक ढाँचों की जरूरत शायद न हो। भारत में आदर्शवाद हमेशा से युवावस्था की स्वाभाविक विशेषता रहा है। जब युवाओं को स्थापित राजनीतिक विमर्श में कोई प्रभावशाली आदर्श नहीं मिलता, तो वे उसकी तलाश कहीं और करने लगते हैं।

इसलिए विद्रोही युवाओं को हेय दृष्टि से देखने वाले रूढ़िवादी पेशेवर बुद्धिजीवियों को इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेना चाहिए। प्रशासनिक तंत्र को भी ऐसा ही करना होगा। युवाओं की ऊर्जा के इस विस्फोट को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय राज्य को ऐसे रास्ते तलाशने चाहिए, जिनसे समावेशी सामाजिक व्यवस्था के भीतर शिक्षा, रोजगार, गरिमा और निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी के अधिक अवसर उपलब्ध कराए जा सकें।

जंतर-मंतर का यह घटनाक्रम एक चेतावनी भी हो सकता है कि केवल आर्थिक विकास किसी समाज को दिशा नहीं दे सकता। व्यक्तिगत उन्नति और बाजार-केंद्रित आकांक्षाओं से प्रेरित विकास के दशकों ने अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन समाज के बड़े हिस्से को उपेक्षित और अनसुना महसूस करने के लिए भी छोड़ दिया है।

अब जो आवाज उभर रही है, वह कुछ और माँग रही है—ऐसा समाज, जिसकी बुनियाद केवल आर्थिक वृद्धि पर नहीं, बल्कि समानता, न्याय, गरिमा और सामाजिक जिम्मेदारी पर भी टिकी हो। इसलिए इस आंदोलन को विपक्ष की साजिश, जेन-ज़ी के अस्थायी फैशन या महज कानून-व्यवस्था की चुनौती बताकर खारिज करना एक बहुत बड़ी भूल होगी।

मोदी सरकार जितनी जल्दी युवाओं के इस आक्रोश के पीछे छिपे गहरे सामाजिक संदेश को समझ लेगी, उतना ही बेहतर होगा—न केवल सरकार के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए भी अच्छा होगा|

लेखक मीडियामैप न्यूज़ नेटवर्क के प्रधान संपादक और स्वैच्छिक सामाजिक संगठन एमबीकेएम फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं

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