भारतीय ज्ञान पंरपराः स्वामी विवेकानन्द और डा मोहन भागवत की समदृष्टि
Indian Knowledge Tradition: The Shared Vision of Swami Vivekananda and Dr. Mohan Bhagwat.
सर्वेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार, राज्य मुख्यालय लखनऊ
आज 11 सितम्बर है, शिकागो में स्वामी विवेकानन्द द्वारा विश्व धर्म सम्मेलन में 1893 को दिये गए ऐतिहासिक भाषण की 133 वीं जयंती। यह भाषण आज भी केवल शिकागो नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व पटल पर भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रतीक स्वर के रूप मे गूंज रहा है। इस भाषण ने विश्व को यह बताया था कि भारत की मूल सोच क्या है, भारत में बन्धुत्व और अपनेपन के तत्व क्या हैं और उनका भारतीय ज्ञान परंपरा में स्रोत क्या है। इस भाषण के ठीक 133 साल बाद एक और संत प्रकृति के भारतीय चिंतक, हिन्दू समाज को सर्वस्व अर्पित कर चुके डा मोहन भागवत ने उक्त पंक्तियों को न्यूयार्क में 29 अगस्त 2026 को दोहराया है। डा भागवत ने भारत के एकत्व (Oneness) दर्शन को 6000 अमेरिकी नागरिकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। दोनों के भाषणों में तीन समानताएं हैं, दोनों अमेरिका की धरती पर हुए, दोनों में श्रोताओं की संख्या लगभग समान थी। शिकागो धर्म सम्मेलन में 7000 लोग उपस्थित थे, जबकि न्यूयार्क के सम्मेलन में उपस्थिति 6000 थी। तीसरी समानता यह है कि स्वामी जी के सम्मुख विश्व के सभी धर्मों के प्रमुख वक्ता, दार्शनिक उपस्थित थे, डा मोहन भागवत के सम्मुख विश्व के 30 देशों के 180 धार्मिक नेता उपस्थित थे। संदेश समान-किसी से भेदभाव नहीं, सभी में अपनत्व का दर्शन।
स्वामी जी जिस समय अमेरिका गए थे। उस दौर में भारतीय दर्शन और चिंतन के प्रति विश्व स्तर पर उतनी जागरूकता नहीं थी जितनी आज है। वह युग संचार क्रांति का भी नहीं था। लेकिन, स्वामी जी ने उस समय वह संदेश दे दिया, जिसमें भारत का मूल तत्व समाया हुआ है। स्वामी जी ने अपने भाषण की शुरुआत में ही कहा- मैं आपको भारत की प्रचीन संत परंपरा की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी (सनातन धर्म) की ओर से धन्यवाद देता हूं। उन्होंने कहा कि मुझे एक ऐसे धर्म से होने पर गर्व है जिसने दुनिया को सहिष्णुता (Tolerance) और सार्वभौमिक स्वीकार्यता (Universal Acceptance) दोनों का पाठ पढाया है। हम केवल सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते, बल्कि हम दुनिया के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग के लिए वैविध्य में एकत्व का दर्शन प्रस्तुत किया। गीता का श्लोक और श्रुति के ज्ञान का उल्लेख किया।
एकत्व यानि के वननैस का यहीं संदेश लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत न्यूयार्क पहुंचे। उनके भाषण में वही तत्व समाहित हैं जोकि स्वामी विवेकानन्द के भाषण में हैं। न्यूयार्क के मैडिसन स्क्ववायर गार्डन में 29 अगस्त 2026 को अमेरिकन हिन्दूज फार एंगेजमेंट एंड डायलाग (एहेड फोरम) द्वारा आयोजित यूनिवर्सल वननैस सेलिब्रेशन में डा. मोहन भागवत ने जब संबोधन किया तो लगा एक बार फिर स्वामी विवेकानन्द का प्रकटीकरण हुआ है। उन्होंने उन्हीं शब्दों को दोहराया और वही भाव व्यक्त किया जो स्वामी जी ने 133 साल पहले किया था। डा मोहन भागवत ने कहा कि एक शब्द की प्रायः चर्चा होती है बहुलवाद (Pluralism) वहीं जब हम भारत की बात करते हैं तो एक दूसरा शब्द या वाक्यांश सामने आता है – यूनिटी इन डायवर्सिटी (विविधता में एकता) । उन्होंने कहा कि भारत के लिए एकता और विविधता, दोनों उसके डीएनए में हैं।
भारतीय दृष्टि की चर्चा करते हुए डा भागवत ने कहा कि हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे उसे पूरा करना होता है। भारत को जो नियति मिली है, वह है विविधता में एकता के सत्य को साकार करना और समय समय पर पूरी दुनिया को भी इस एकत्व का बोध कराना। उन्होंने आगे कहा कि हम एक हैं और विविधता के कारण हमारी वह एकता और भी सुसज्जित होती है। इसलिए विविधता का उत्सव मनाया जाना चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। डा भागवत ने कहा कि वह सिद्धांत जो सबको जोडता है, सबको आत्मसात करता है, किसी प्रकार का विभाजन उत्पन्न नहीं करता , सभी के बीच संतुलन बनाये रखता है और मध्यमार्ग दिखाता है, वही धर्म है।
आज स्वामी विवेकानन्द के शिकागो भाषण की जयंती अवसर पर जहां हमें उस भाषण को पढ़ने, चिंतन और मनने करके आत्मसात करने की आवश्यकता है, वहीं डा मोहन भागवत के न्यूयार्क भाषण को भी पूरा पढने, चिंतन और मनन करने के बाद हिन्दुत्व की मूल भावना और सर्वग्राह्यता के संदेश को समझना आवश्यक है। कुछ लोग डा मोहन भागवत के न्यूयार्क भाषण को पढे बगैर, उसके मूल तत्व को समझे बगैर चर्चा, परिचर्चा और विमर्श कर रहे हैं। उन्हें पहले इसे पूरा पढ़ना चाहिए। इसके बाद सभी तरह के भ्रम समाप्त हो जाएंगे।
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