सादगी का आख़िरी चराग़: आलम बदी आज़मी
Alam Badi Azmi
श्रीधर अग्निहोत्री
कभी-कभी कोई व्यक्तित्व केवल चुनाव नहीं जीतता, बल्कि लोगों का विश्वास जीतकर इतिहास का हिस्सा बन जाता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में निजामाबाद (आजमगढ़) के विधायक आलम बदी आज़मी ऐसा ही एक नाम थे। उनके निधन के साथ मानो राजनीति का वह अध्याय भी विराम ले गया, जिसमें पद से अधिक सेवा, सत्ता से अधिक सादगी और राजनीति से अधिक जनविश्वास का महत्व था।
आज जब राजनीति को वैभव, सुरक्षा घेरे और आलीशान जीवनशैली से जोड़ा जाने लगा है, तब आलम बदी आज़मी का जीवन एक जीवंत मिसाल बनकर सामने आता है। पाँच बार विधायक बनने के बाद भी वे एक साधारण टीनशेड वाले घर में रहते रहे। विधानसभा की कार्यवाही में अक्सर स्कूटर, साइकिल या रोडवेज बस से पहुँचने वाले इस जनप्रतिनिधि ने कभी सत्ता को अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया। जीवन के अंतिम वर्षों में खरीदी गई उनकी निजी कार भी उतनी ही साधारण थी, जितना उनका व्यक्तित्व।
16 मार्च 1936 को आजमगढ़ के बिन्दवल गाँव में जन्मे आलम बदी आज़मी ने इलेक्ट्रिकल एवं मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया था। वर्ष 1996 में पहली बार आजमगढ़ की निजामाबाद सीट से पहली बार विधायक चुने गए। इसके बाद 2002, 2012, 2017 और 2022 में जनता ने उन्हें पुनः अपना प्रतिनिधि बनाया। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को 34 हजार से अधिक मतों से पराजित कर पाँचवीं बार विधानसभा में प्रवेश किया। उनके सार्वजनिक जीवन पर कभी कोई आपराधिक दाग नहीं लगा और न ही उन्होंने राजनीति को धन अर्जित करने का माध्यम बनाया।
उनका चुनाव प्रचार भी अनोखा होता था। न बड़े-बड़े मंच, न होर्डिंग, न दिखावटी रैलियाँ। वे स्वयं गाँव-गाँव, गली-गली जाकर लोगों से मिलते, उनकी समस्याएँ सुनते और सहजता से उनका विश्वास जीत लेते। पेशे से इंजीनियर होने के कारण विकास कार्यों की गुणवत्ता पर उनकी पैनी नज़र रहती थी। जनहित के मामलों में वे किसी भी प्रकार के समझौते के पक्षधर नहीं थे।
उनके करीबी सहयोगियों के अनुसार, विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल किए गए शपथपत्र में उनके बैंक खाते में बहुत कम राशि दर्ज थी। यह तथ्य स्वयं बताता है कि उन्होंने राजनीति को कभी संपत्ति अर्जित करने का माध्यम नहीं बनाया। उनकी वास्तविक पूँजी जनता का प्रेम, विश्वास और सम्मान था।
आलम बदी आज़मी दुनिया से जाने से पहले यह संदेश दे गए कि जनप्रतिनिधि की असली पहचान उसके काफिले, बंगले या वैभव से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, ईमानदारी और जनता के प्रति समर्पण से होती है।
आने वाली पीढ़ियों को शायद यह विश्वास करना कठिन लगे कि उत्तर प्रदेश में एक ऐसा विधायक भी था, जो पैदल चलता था, स्कूटर से विधानसभा पहुँचता था और जीवनभर सादगी को अपना सबसे बड़ा सम्मान मानता रहा। उनके जाने से राजनीति का एक उज्ज्वल, निष्कलुष और प्रेरणादायी अध्याय सदैव के लिए इतिहास का हिस्सा बन गया।
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