ज़िंदगी और कूटनीति: शतरंज सिर्फ खेल नहीं, जीने का सलीका है
World Chess Day is celebrated annually on July 20th
लेखक : दिलीप कुमार पाठक
जब खेल खत्म होता है, तो राजा और प्यादा दोनों एक ही डिब्बे में बंद कर दिए जाते हैं। शतरंज की बिसात का यह सबसे सीधा नियम, असल में हमारी जिंदगी का भी सबसे बड़ा कड़वा सच है। आज दुनिया 'अंतर्राष्ट्रीय शतरंज दिवस' मना रही है लेकिन यकीन मानिए, यह महज किसी एक खेल का जश्न नहीं है। यह तो इंसानी दिमाग के उस अनोखे जादू का सम्मान है, जो लकड़ी के चंद टुकड़ों और 64 खानों के भीतर पूरी कायनात के फैसले तय कर देता है। आज के इस दौर में, जब मोबाइल की रील्स और शॉर्ट्स ने हमारी गहराई से सोचने की आदत को लगभग खत्म कर दिया है, शतरंज की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। एक मजे की बात देखिए, जिस खेल को आज पूरी दुनिया कूटनीति और दिमाग की सबसे बड़ी कसौटी मानती है, उसकी असली जड़ें हमारे अपने हिंदुस्तान में हैं। सदियों पहले हमारे पुरखे इसे 'चतुरंग' कहते थे। भारत की मिट्टी से निकला यह खेल दुनिया भर का चक्कर लगाकर आज वापस अपने घर में एक नए अवतार में लौट आया है। आज जब हम इस खेल को देखते हैं, तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। भारतीय शतरंज इस समय अपने स्वर्णिम दौर में है। विश्वनाथन आनंद ने जिस सिलसिले को शुरू किया था, उसे आज डी. गुकेश, आर. प्रज्ञानंद और अर्जुन एरिगैसी जैसे युवाओं ने दुनिया के नक्शे पर चमका दिया है। इन लड़कों ने दुनिया के बड़े-बड़े धुरंधरों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है और यह साबित किया है कि भारत सिर्फ शतरंज की शुरुआत करने वाला देश नहीं है, बल्कि इसका बॉस भी है। पर क्या शतरंज को सिर्फ एक खेल के चश्मे से देखना सही होगा? बिल्कुल नहीं। अगर आप इसे थोड़ा ठहरकर समझेंगे, तो यह लाइफ मैनेजमेंट की सबसे बेहतरीन गाइड बुक है। यह खेल हमें सिखाता है कि आप जो भी कदम उठाते हैं, उसकी एक कीमत चुकानी पड़ती है। बिना सोचे-समझे चली गई एक भी लापरवाही भरी चाल आपको बर्बादी की तरफ ले जा सकती है। यही बात हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर भी फिट बैठती है।
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