भाषा के नैतिक उपदेशकों से कुछ सवाल..!

Some questions directed towards the moral guardians of language..!

Jul 26, 2026 - 11:53
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भाषा के नैतिक उपदेशकों से कुछ सवाल..!

दया शंकर राय 

देख रहा हूं कुछ लोग जंतर मंतर पर छात्रों युवाओं के आंदोलन पर उनकी भाषा को लेकर नैतिक उपदेश देते हुए तरह तरह की टिप्पणियां कर रहे हैं। इनमें सत्ता की चकाचौंध से आसीक्रांत और आह्लादित आंदोलन विरोधी तो हैं ही कुछ ऐसे मित्र भी हैं जो आंदोलन समर्थक हैं लेकिन नैतिकता की सारी उम्मीद इस युवा पीढ़ी से ही चाहते हैं। और ऐसा नैतिक उपदेश देते हुए वे यह भूल जाते हैं कि कोई भी पीढ़ी अपने आसपास के समाज से ही बहुत कुछ सीखती है किसी शून्य में नहीं..! और पिछले 12 साल में हमारे आज के सत्ताधीशों ने उन्हें कौन सी भाषा सिखाई है..? " "रेनकोट पहन कर नहाने वाले प्रधानमंत्री," "डेढ़ करोड़ की गर्ल फ्रेंड", "कपड़ों से पहचान लिए जाते हैं," " विदेशी बार बाला," " दीदी ओ दीदी", "मंच से गोली मारों सालों को" का आवाहन जैसे सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं..! ये भाषा उनकी है जो सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर विराजमान हैं और उन पर देश को गढ़ने की जिम्मेदारी सौंपी गई है..! तो यही भाषा सिखाई है आज की पीढ़ी को हमारे तथाकथित रहबरों ने ..! और यही नहीं बहुसंख्यक समाज के एक हिस्से ने भी उनके अंदर साम्प्रदायिक घृणित विद्वेष के बीज भी बोए है। कुछ समझदार मित्र यह भूल जाते हैं कि इस तरह के युवा आंदोलन में आक्रोश की अभिव्यक्ति कई दफा कुछ कच्चे ढंग से भी हो जाया करती है जो आंदोलन का कोई मुख्य स्वर न होकर गुस्से का तात्कालिक इजहार भर होता है। ऐसे कथित "नैतिक" मित्र क्या यह भूल जाते हैं कि अपने घरों में डाइनिंग टेबल पर बैठकर जब अपने ही बच्चों के बीच ..."चमारों का दिमाग इतना खराब हो गया है कि वे अब सिर पर चढ़कर आग मू....ने" लगे हैं जैसी भाषा का प्रयोग करते हैं तो वे अपने बच्चों को कौन सी नैतिकता और भाषाई मर्यादा सिखाते हैं..?

 ऐसे नैतिक उपदेश देने वालों मित्रों को आंदोलन के सबसे मजबूत, वैचारिक दृढ़ता वाले नेहा, मनीष और आमिर जैसे उन तमाम चेहरों पर नजर डाल लेनी चाहिए जो हजारों छात्रों की मुखर आवाज बन चुके हैं..! आंदोलन की किसी छिटपुट , अल्पसंख्यक और महत्वहीन प्रवृत्ति पर हमला बोलना और उसी को आंदोलन की मुख्य धारा मान लेना आंदोलन विरोधियों और सत्ताधारियों के चौतरफा बिछाए जाल में फंसना होता है..! ऐसे बंधुओं को आंदोलन के दौरान जरा इन नौजवानों की उस रचनात्मक दृष्टि पर भी गौर कर लेना चाहिए कि कैसे आंदोलन परिपक्वता भी सिखाता है। ऐसी टिप्पणियां करने से पहले उन्हें पटना के उस दृश्य से खुद भी कुछ सीखना चाहिए कि कैसे पुलिस दमन को टालने और उन्हें रोकने के लिए बच्चों ने राष्ट्रगान गाना शुरू कर पुलिस वालों को भी राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर कर दिया। तो ऐसे नैतिक बंधुओं से यह कहना है कि कोई आंदोलन ही आंदोलन के कुछ कमजोर पहलुओं की भी समीक्षा करते हुए उन्हें दूर करना भी सिखाता है और भाषा और विचार के स्तर पर भी धीरे धीरे समृद्ध करते हुए उन्हें उत्तरोत्तर परिपक्व भी बनाता है।

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