शहरों को हीट आइलैंड बनने से रोकने की सरकारी कसरत

MITIGATING THE URBAN HEAT ISLAND EFFECT IN INDIAN CITIES

Jul 21, 2026 - 12:38
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शहरों को हीट आइलैंड बनने से रोकने की सरकारी कसरत

-          राज्यसभा में आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल ने लिखित जवाब दिया  

नई दिल्ली : भारत में अंधाधुंध शहरीकरण और बेतरतीब निर्माण ने तापमान को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है| देश के बड़े शहर पिछले कुछ दशकोण में हीट वेब का आईलैंड बन गए हैं|

ऐसे में सरकारी स्तर पर शहरों को हीट आईलैंड बनने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने 2019 में 'हीट वेव की रोकथाम और प्रबंधन के लिए कार्य योजना तैयार करने हेतु राष्ट्रीय दिशा-निर्देश' तैयार किए हैं। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, शहरों को अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव में योगदान देने वाले प्रमुख कारकों की पहचान करने के लिए संवेदनशीलता का आकलन करना चाहिए और अपनी हीट एक्शन प्लान (एचएपी) में उचित शमन उपायों को शामिल करना चाहिए। अब तक 23 राज्यों, 195 जिलों और 64 शहरों द्वारा हीट एक्शन प्लान (एचएपी) तैयार किए जा चुके हैं। से रोकने की कसरत शुरू हुई है|

यह जानकारी राज्यसभा में आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल ने लिखित जवाब दी| उन्होने बताया कि संविधान की 12वीं अनुसूची के अनुसार, नगर नियोजन राज्य सरकारों और शहर के स्तर पर शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी)/शहरी विकास प्राधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में आता है। भारत सरकार योजनाओं के माध्यम से हस्तक्षेप, सलाह, दिशा-निर्देशों, वित्तीय सहायता और तकनीकी सहायता के ज़रिए शहरी नियोजन इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए राज्यों के प्रयासों को गति देती है।

इसके अलावा, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने "भारतीय शहरों में लू के दौरान अनौपचारिक श्रमिकों की सुरक्षा" पर एक एडवाइजरी जारी की है। यह परामर्श स्वास्थ्य, सुरक्षा और लैंगिक-संवेदनशील अनुकूलन से संबंधित उपायों को रेखांकित करता है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छायादार वेंडिंग ज़ोन, पेयजल सुविधाओं, कूलिंग सेंटर, काम के लचीले घंटे और गर्मी से संबंधित चेतावनियों के समय पर प्रसार जैसे उपायों के माध्यम से स्ट्रीट वेंडर्स  और अन्य बाहरी श्रमिकों की आवश्यकताओं को हीट एक्शन प्लान में शामिल करने की सिफारिश की गई है।

दिल्ली एनसीटी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, जलवायु परिवर्तन पर दिल्ली राज्य कार्य योजना (एसएपीसीसी 2.0) के संशोधन के तहत आईएमडी के आंकड़ों (1991-2020) और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आपीसीसी) की एआर6 जलवायु परिदृश्यों का उपयोग करके एक व्यापक जलवायु संवेदनशीलता मूल्यांकन किया गया है। इस मूल्यांकन में बढ़ते तापमान और भीषण हीट वेव्स को दिल्ली के दो प्रमुख जलवायु संवेदनशीलता हॉटस्पॉट में से एक के रूप में पहचाना गया है। इस अध्ययन के अनुसार, सदी के मध्य तक एसएसपी (सामाजिक-आर्थिक पथ) 2-4.5 के तहत ग्रीष्मकालीन अधिकतम तापमान में लगभग 1.5°C और एसएसपी 5-8.5 के तहत 2.1°C तक की वृद्धि का अनुमान जताया गया है, साथ ही अत्यधिक गर्म दिनों की आवृत्ति में भी वृद्धि होगी। दक्षिण दिल्ली को सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील जिला माना गया है, जबकि नई दिल्ली सबसे कम संवेदनशील है। यह मूल्यांकन अर्बन हीट स्ट्रेस को जनस्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और आजीविका के लिए एक बड़े जोखिम के रूप में रेखांकित करता है। संशोधित दिल्ली एसएपीसीसी में अर्बन हीट आइलैंड (यूएचआई) के प्रभावों को कम करने और शहरी जलवायु अनुकूलनशीलता में सुधार के लिए कई उपायों को शामिल किया गया है। इसमें भवनों में कूल रूफ लगाना, कूलिंग कॉरिडोर का विकास और शहरी हरित बुनियादी ढांचे का विस्तार, शहरी नियोजन एवं अवसंरचना विकास में यूएचआई प्रबंधन का एकीकरण, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के पर्यावरण-अनुकूल पुनर्विकास को बढ़ावा देना, और जलवायु अनुकूलनशीलता में सुधार के लिए वर्षा जल निकासी को मजबूत करना, वेटलैंड्स व शहरी जल निकायों का पुनरुद्धार तथा बाढ़-रोधी बुनियादी ढांचा शामिल है। इसके अलावा, इसमें दिल्ली हीट एक्शन प्लान के कार्यान्वयन के माध्यम से शहर स्तर पर ऊष्मा सहनशीलता को मजबूत करने की परिकल्पना की गई है, जिसमें प्रारंभिक ऊष्मा चेतावनी प्रणाली, संवेदनशीलता का आकलन और मैपिंग, जन जागरूकता, क्षमता निर्माण, संवेदनशील समूहों की सुरक्षा, कूल रूफ को बढ़ावा देना, शहरी हरित क्षेत्र और अन्य जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचा, तथा मजबूत ऊष्मा-स्वास्थ्य निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली शामिल हैं।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) से प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंत्रालय द्वारा जारी 'इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान' (आईसीएपी) पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक लाभ सुरक्षित करते हुए सभी के लिए टिकाऊ कूलिंग और थर्मल आराम प्रदान करने के व्यापक लक्ष्य के साथ विभिन्न क्षेत्रों में टिकाऊ कूलिंग का एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रदान करता है। इस योजना का उद्देश्य कूलिंग की मांग को कम करना, ऊर्जा दक्षता में सुधार करना और बेहतर तकनीकी विकल्पों को बढ़ावा देना है जो जलवायु अनुकूलनशीलता को बढ़ाने में योगदान देते हैं।

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