लेख छटपटाहट
article : chhatpatahat
लेखक : डॉ संजय पवार, पुणे महाराष्ट्र
कहने के लिए कितना अच्छा है कि मेरे बच्चे विदेश में नौकरी करते हैं। आज देश के किसी भी राज्य के चाहे किसान परिवार से हो या नौकरीपेशा परिवार अपने बच्चों को ऊँची शिक्षा देकर विदेश में नौकरी के लिए भेजना चाहते है। बच्चे भी भारत में रहकर अच्छी डिग्रियाँ प्राप्त कर विदेशों की नौकरियाँ ढूँढते है। विदेशों में भी भारतीय छात्रों की मेहनत और योग्यता का स्वागत किया जा रहा है। यह चित्र अच्छा जरूर लगता है। हमारे युवा अपनी योग्यता के बल पर विदेश की धरती को हर क्षेत्र में बल दिए जा रहे है। वर्तमान समय में दुनिया के कोने-कोने में हमारे युवा अपनी सेवाएं उपलब्ध करा कर चार चाँद लगा रहे हैं।
देश के कुछ युवा विदेश में रहकर ही भारत में रह रहे अपने परिवार की देखभाल भी कर रहे है। माता-पिता भाई-बहन को उनसे मोबाइल या लैपटॉप पर वीडियो द्वारा बात करके अच्छा लगता है। हाल-चाल पुछी जाती है। आप अस्पताल क्यूँ नहीं गए? ये प्यार भरी डांट बच्चे वहीं से जब भरते है तब माँ बाप का मन भर आता है, गला रुंध जाता है। बैंक खाते में पैसा मिल गया या नहीं पूछते है। मैं जल्द आपसे मिलने भारत आ रहा हूँ बस मेरी छुट्टी मंजूर हो जाए। बच्चे की यह सारी बातें सबको गदगद कर देती है। देर सबेर बातचीत होती है लेकिन बात खत्म होते ही फिर खालीपन भर जाता है दोनों ओर। विदेश की नौकरी तो है लेकिन ढलती उम्र में माँ-बाप से बहुत दूर रहना बहुत बड़ी मजबूरी भी है। यह मजबूरी खलती दोनों ओर है मगर किया क्या जा सकता है।
विदेश में रह रहे कुछ विवाहित युवा पति-पत्नी दोनों नौकरी करनेवाले हैं। कुछ युवाओं की पति पत्नियाँ वहीं विदेशी भी है। सबकी अलग-अलग समस्या है। माता-पिता के लिए उनका बच्चा विदेश में नौकरी करता है यह भले ही गौरव की बात हो लेकिन मन उनका रोता है कौन देख पाता है। विदेश में रहनेवालों को भारतीय परिजनों की यादें सताती है।
विदेश में नौकरी अच्छी तो है। अच्छी तनख्वाह, अच्छा रहन-सहन, गाड़ियाँ, मौज मस्ती,मान सम्मान है। सब कुछ है, नहीं है तो भारतीयता और अपने परिजन। यह तो चित्र का एक हिस्सा हुआ। चित्र का दूसरा हिस्सा विदेशीय स्तर पर थोड़ा बहुत अलग- अलग भी होता है जो दिखता नहीं लेकिन वहाँ रहते है उनको ही पता है। विदेश की धरती पर सब कुछ सामान्य कभी नहीं होता। उनके नियम, नीतियों और मानसिकता के अनुकूल अपने आपको ढालना पड़ता है। शुरू में होनेवाली मुश्किलें धीरे धीरे सामान्य हो जाती है तब स्वदेशी मानसिकता सही गलत भी लगने लगती है। एक बात तो यह ध्यान में रखनी होगी कि विदेश की धरती पर नौकरी में पैसा बहुत मिलता होगा परंतु भारत से कई गुना ज्यादा महंगाई होती है। वहां की जीवन पद्धति अलग है इसलिए खर्चे बढ़ते है। एक और बात है कि कोई भी देश ज्यादा पैसा इसलिए नहीं देता कि आप भारतीय बैंकों में अपना पैसा जमा करते रहो। पैसा बहुत है लेकिन वहाँ की जीवन पद्धति के अनुसार खर्चा भी बहुत ज्यादा होता है।
भारतीय जो विदेश में किसी भी वजह से रहते हो उनकी परेशानी ये है कि उनसे ज्यादा अपेक्षाएँ रखी जाती है। उसी वक्त उनकी अपनी भी मजबूरियाँ है उनके बारे में नहीं सोचा जाता। वे चाहे नौकरी करते हो या कोई उद्योग ही करते हो उन्हें वहां के नीति नियमों पालन करना होता है। उनके मन में अपने परिजनों के प्रति एक डर बना हुआ होता है कि ना जाने देर सबेर किसी का प्रिय या अप्रिय घटना का फोन ना आ जाए। अगर ऐसा संदेश आएगा तो क्या आसानी से अपने वतन निकल पाएंगे। विदेश से निकलने से पहले छुट्टी का मंजूर होना जरूरी है तभी वे अपने मुख्यालय से बाहर जा पाएंगे। हवाई टिकट का इंतजाम तो हो भी जाएगा लेकिन कंपनी लंबी छुट्टी आसानी से नहीं मिलती।
कुछ दिन पहले एक खबर सुनी थी कि भारत में रहने वाले पिताजी के देहांत पर इकलौता बेटा अपने घर नहीं जा पाया। वजह थी कि अमरीका की कंपनी से उसे तुरंत की छुट्टी नहीं मिली थी। छुट्टी मिली कुछ दिन बाद की। वह समय पर नहीं जा पाया। बेटा अपनी मजबूरी पर बहुत रोया था। कुछ दिन माँ के साथ बिताकर उसे वापस लौटना पड़ा था। एक किस्सा तो यह भी सुना था कि माँ के देहांत पर विदेश में रहनेवाले दोनों बेटे वीडियो कॉन्फ्रेंस द्वारा अंतिम संस्कार पर उपस्थित रहे। तत्काल छुट्टी ना मिलने के कारण दोनों माता के अंतिम संस्कार में पहुँच नहीं पाएं। ज़रा सोचिए उन बेचारों की क्या अवस्था होगी। अच्छी बुरी घटनाओं में वे शामिल नहीं हो सकते। उनकी वेदना उन्हें ही पता होगी। विदेश की नौकरी चकाचौंध भरी तो है लेकिन उसके अपना वतन, अपने लोगों से सुदूर होने की छटपटाहट वे ही जानते है।
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