नाना पाटेकर : किरदारों के पीछे छिपा असाधारण कलाकार

Actor Nana Patekar passes away on Thursday

Oct 8, 2026 - 18:34
Oct 8, 2026 - 19:47
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नाना पाटेकर : किरदारों के पीछे छिपा असाधारण कलाकार

लेखक : श्रीधर अग्निहोत्री

वरिष्ठ पत्रकार

नाना पाटेकर का नाम आते ही आंखों के सामने एक ऐसा चेहरा उभरता है, जिस पर कठोरता भी थी, गंभीरता भी और भीतर तक उतर जाने वाली बेचैनी भी। उनकी आंखें बहुत कुछ कहती थीं और आवाज में ऐसा कंपन था, जिसमें गुस्सा, दर्द, आक्रोश और सच कहने का साहस एक साथ महसूस होता था। हिंदी सिनेमा में बहुत कम कलाकार ऐसे हुए हैं, जिनकी पर्दे पर उपस्थिति मात्र से कहानी का तापमान बदल जाता था। नाना पाटेकर उन्हीं विरल कलाकारों में से एक थे।

आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके निधन का दुख केवल एक अभिनेता के चले जाने का दुख नहीं है। यह उस विशिष्ट अभिनय शैली के एक बड़े अध्याय के समाप्त होने का दुख भी है, जिसने भारतीय सिनेमा को अपनी अलग भाषा दी। 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की आयु में गोवा स्थित अपने आवास पर हृदयाघात के बाद नाना पाटेकर का निधन हो गया। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें बचाने की भरसक कोशिश की, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।

नाना पाटेकर का अभिनय केवल संवाद बोलने या चेहरे पर भाव लाने की कला नहीं था। वह किरदार को जीने की कोशिश करते थे। उनकी आवाज का उतार-चढ़ाव, संवादों के बीच का ठहराव, चेहरे की कठोर रेखाएं और आंखों में दिखाई देने वाली बेचैनी—सब मिलकर उनके अभिनय को एक अलग ऊंचाई देते थे। यही कारण था कि जब वह किसी दृश्य में आते थे तो दर्शक केवल उन्हें देखता नहीं था, बल्कि उनके साथ उस परिस्थिति को महसूस करने लगता था।

मराठी रंगमंच से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे मराठी और हिंदी सिनेमा तक पहुंचा। 1978 की फिल्म ‘गमन’ से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई और लगभग पांच दशक के करियर में उन्होंने कई यादगार भूमिकाएं निभाईं।

‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘यशवंत’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग सामने रखे। कभी वह व्यवस्था से लड़ता आम आदमी बने, कभी अपराध की दुनिया का कठोर चेहरा, कभी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा विद्रोही और कभी ऐसा पुलिस अधिकारी, जिसकी कठोरता के पीछे संवेदनशील मन छिपा था।

‘परिंदा’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और ‘क्रांतिवीर’ ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया। लेकिन नाना पाटेकर की असली पहचान किसी पुरस्कार से नहीं बनी। उनकी पहचान बनी उस बेचैनी से, जो उनके अभिनय के भीतर लगातार मौजूद रहती थी और दर्शक को भीतर तक झकझोर देती थी।

वह संवाद बोलते नहीं थे, जैसे किरदार के भीतर वर्षों से जमा हुआ लावा बाहर निकाल रहे हों। उनके संवादों में शब्दों से ज्यादा उनका विश्वास बोलता था। वह जब गुस्सा करते थे तो केवल आवाज ऊंची नहीं होती थी, पूरा चेहरा बोलने लगता था। जब दुख व्यक्त करते थे तो कई बार आंखों की हल्की-सी नमी ही पर्याप्त होती थी।

उनका एक और बड़ा गुण था। वह किरदार को अपने व्यक्तित्व से ढकने के बजाय खुद को किरदार में विलीन कर देते थे। पर्दे पर नाना पाटेकर कई बार दिखाई ही नहीं देते थे; वहां केवल वह चरित्र रह जाता था, जिसे वह निभा रहे होते थे। यही किसी भी अभिनेता की सबसे बड़ी सफलता मानी जा सकती है।

गंभीर भूमिकाओं के साथ उन्होंने हास्य को भी उसी सहजता से अपनाया। ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी इसका शानदार उदाहरण है। जिस अभिनेता को दर्शक ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसी गंभीर भूमिकाओं के लिए जानते थे, वही ‘वेलकम’ में हास्य का ऐसा रंग भरता है कि किरदार आज भी दर्शकों की स्मृतियों में जीवित है। यही उनकी बहुमुखी प्रतिभा थी।

नाना पाटेकर का व्यक्तित्व हालांकि हमेशा विवादों से मुक्त नहीं रहा। उनके व्यवहार और निजी जीवन को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रहीं। इनमें सबसे चर्चित प्रसंग अभिनेत्री तनुश्री दत्ता से जुड़ा था। तनुश्री दत्ता ने 2018 में 2008 की फिल्म ‘Horn ‘Ok’ Pleassss’ की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर पर अनुचित व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए थे। नाना ने इन आरोपों से इनकार किया था। बाद में पुलिस जांच में उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की बात सामने आई और मामला आगे नहीं बढ़ सका। इसलिए इस पूरे प्रसंग को आरोप और जवाब के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए, सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं।

उनके निजी जीवन को लेकर भी मीडिया में कई तरह की चर्चाएं होती रहीं। लेकिन किसी कलाकार के निजी जीवन को लेकर सामने आई चर्चाओं के आधार पर उसके चरित्र का अंतिम मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा। एक कलाकार के रूप में उनके योगदान और निजी जीवन से जुड़े विवादों को अलग-अलग संदर्भों में देखना ही संतुलित दृष्टि होगी।

नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अभिनय के लिए किसी कृत्रिम आभा का सहारा नहीं लिया। वह पारंपरिक अर्थों में चमकदार फिल्मी नायक नहीं थे। उनकी ताकत उनका चेहरा, उनकी आवाज, उनका ठहराव और जीवन की खुरदरी सच्चाइयों से जुड़ी उनकी अभिनय शैली थी।

उनके किरदारों में समाज का संघर्ष, व्यवस्था की विडंबना, मनुष्य की कमजोरी और उसके भीतर पलता विद्रोह दिखाई देता था। वह दर्शक को केवल कहानी नहीं सुनाते थे, बल्कि उसे उस कहानी के भीतर खड़ा कर देते थे। उनके अभिनय में आक्रोश था, लेकिन उसके पीछे संवेदना भी थी। कठोरता थी, लेकिन उसके भीतर मनुष्य की कमजोरियों के लिए जगह भी थी।

नाना पाटेकर ने अभिनय को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना। उनके लिए अभिनय शायद जीवन को समझने और उसे पर्दे पर उतारने की एक प्रक्रिया था। उनकी संवाद अदायगी का प्रभाव इतना गहरा था कि कई संवाद फिल्मों की सीमा पार कर दर्शकों की स्मृति का हिस्सा बन गए।

एक अभिनेता के मूल्यांकन में उसके निजी जीवन और उसके कलात्मक योगदान—दोनों को अलग-अलग देखने की आवश्यकता होती है। नाना पाटेकर के व्यक्तित्व को लेकर प्रश्न अपनी जगह हैं, लेकिन उनके अभिनय की शक्ति और भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को नकारना संभव नहीं।

आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार हमारे बीच हैं। ‘परिंदा’ का वह संसार, ‘क्रांतिवीर’ का आक्रोश, ‘अब तक छप्पन’ का कठोर पुलिस अधिकारी, ‘नटसम्राट’ की पीड़ा और ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी—इन सबमें नाना अलग-अलग रूपों में जीवित रहेंगे।

शायद यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है कि उसके जाने के बाद भी उसके किरदार चले नहीं जाते। नाना पाटेकर भी चले गए, लेकिन उनके किरदार रह गए। उनकी आवाज खामोश हो गई, लेकिन उनके संवाद अब भी गूंजेंगे। उनका चेहरा पर्दे से ओझल हो गया, लेकिन उनकी आंखों की बेचैनी दर्शकों की स्मृतियों में बनी रहेगी।

और जब कोई कलाकार अपने निभाए किरदारों में स्वयं को इतना पीछे छोड़ दे कि दर्शक को कलाकार नहीं, केवल चरित्र दिखाई दे—तो समझना चाहिए कि वह अभिनेता नहीं, अभिनय की एक पूरी पाठशाला बन चुका है। नाना पाटेकर के निधन से भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा कलाकार खो दिया है, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकेगी।

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