रैलियों-जुलूसों से आगे बढ़ेगा चुनाव प्रचार, एआई बनेगा पार्टियों का नया हथियार
Election campaigns will move beyond rallies and processions, and AI will become the new tool for political parties.
श्रीधर अग्निहोत्री
लखनऊ। आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार का तौर-तरीका तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। बड़े-बड़े रैलियों, जुलूसों और पारंपरिक प्रचार अभियानों के साथ-साथ अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बनाने की तैयारी है। माना जा रहा है कि इस बार राजनीतिक दल मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए एआई से तैयार वीडियो, ऑडियो, तस्वीरों और सोशल मीडिया कंटेंट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर सकते हैं।
खास बात यह होगी कि चुनावी प्रचार में केवल अपनी पार्टी और नेताओं की उपलब्धियां गिनाने के बजाय विरोधी दल और उसके नेताओं की छवि को प्रभावित करने वाले कंटेंट पर भी खास जोर रह सकता है। समाजवादी पार्टी, भाजपा, बसपा और कांग्रेस समेत प्रमुख दलों के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पहले ही चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। एआई के बढ़ते इस्तेमाल से यह अभियान और ज्यादा आक्रामक और लक्षित होने की संभावना है।
हाल के दिनों में राजनीतिक दलों की गतिविधियों में इसके संकेत भी दिखाई देने लगे हैं। पार्टियां ऐसे युवा चेहरों को आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं, जो सोशल मीडिया, डिजिटल तकनीक और एआई के इस्तेमाल में दक्ष हैं। इनकी जिम्मेदारी चुनावी मुद्दों को नए तरीके से प्रस्तुत करने के साथ ही विरोधी दलों के प्रचार का जवाब देने की भी हो सकती है। आने वाले दिनों में पार्टी कार्यालयों के साथ-साथ अलग-अलग स्तर पर डिजिटल वार रूम सक्रिय किए जाने की संभावना है।
एआई की मदद से किसी नेता के भाषण के कुछ हिस्सों को अलग-अलग वीडियो में बदलकर तेजी से प्रसारित किया जा सकेगा। क्षेत्र विशेष की समस्याओं और मतदाताओं की रुचि के मुताबिक अलग-अलग संदेश तैयार किए जा सकते हैं। इससे कम समय और कम संसाधनों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच बनाई जा सकती है।
हालांकि, एआई के बढ़ते इस्तेमाल के साथ डीपफेक, फर्जी वीडियो, भ्रामक ऑडियो और गलत सूचनाओं का खतरा भी बढ़ेगा। किसी नेता के बयान या वीडियो में तकनीक के जरिये बदलाव कर उसे वास्तविक बताकर प्रसारित किया जाना चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में राजनीतिक दलों के साथ चुनाव आयोग और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के सामने भी बड़ी चुनौती होगी।
चुनावी प्रचार में सबसे बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि अब प्रचार का केंद्र केवल मैदान में जुटने वाली भीड़ नहीं, बल्कि मोबाइल फोन की स्क्रीन होगी। एक वायरल वीडियो हजारों लोगों की सभा से अधिक तेजी से मतदाताओं तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि पार्टियां अपने संदेश को ज्यादा प्रभावी, आकर्षक और तेजी से प्रसारित करने के लिए तकनीक का सहारा लेंगी।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, आने वाला विधानसभा चुनाव जमीन के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लड़ा जाएगा। रैलियां और जनसभाएं पूरी तरह खत्म नहीं होंगी, लेकिन उनके समानांतर एआई आधारित प्रचार अभियान राजनीतिक दलों की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। चुनावी मैदान में जिस पार्टी की डिजिटल टीम ज्यादा तेजी से नैरेटिव बनाने और विरोधी के नैरेटिव का जवाब देने में सक्षम होगी, उसे प्रचार के स्तर पर बढ़त मिल सकती है।
What's Your Reaction?