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कविता : नि:शब्द

प्रियरंजन पाढ़ी की दो कवितायें निशब्द हैं सब, उपवन, समीर, विहग जब, तुम क्या करते हो तब? नहीं सोचते उनको क्या? पीड़ा विगत दिनों की, उभर आती मस्तक पर बन स्वेद कण, मस्तिष्क में दबी स्मृतियां, रहती हैं ज्यों की त्यों, तुम नहीं सोचते उनको क्या? जब होता है निशब्द अधूरी अनकही बातों को तलाशते,…

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कविता : प्रेम…

डॉ जया आनंद प्रेम पाना आसान है इसके लिए अहं को कूटना पीसना है बस थोड़ा सा सरल होना है ….और सरल होना शायद! कितना कठिन !!! …पर मेरे लिए नहीं, कबीर को थोड़ा तो समझा ————————— 2. प्रेम आत्मा को उज्ज्वल करता हुआ विस्तार देता है संकुचन नहीं, विचारों को परिष्कृत करता हुआ उदार…

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