कहानी : रात्रि भोज
story : Ratribhoj by Prof. Ranjodh Singh
लेखक : प्रो.रणजोध सिंह
- लेखक हिमाचल प्रदेश के शिमला में जन्में वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर रणजोत सिंह नलागढ़, सोलन में रहते हैं| आप राजकीय महविद्यालय राम शहर में एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं| आपको देश- विदेश में सम्मानित किया गया है|
महेंद्र प्रताप सिंह जी ने टूरिज्म विभाग के शिमला होटल में प्रबंधक का नया- नया पदभार संभाला था इसलिए वह प्रत्येक कार्य को बड़ी सावधानी पूर्वक कर रहे थे| होटल में आने वाले प्रत्येक आगंतुक के प्रति उनका व्यवहार अत्यंत सोम्य था| उनका यह अटल विश्वास था कि उनकी रोजी-रोटी का आधार कस्टमर है उन्होंने होटल की रिसेप्शन पर बड़े बड़े शब्दों में महात्मा गांधी की यह टिप्पणी लिखवा रखी थी ‘ग्राहक हमारा भगवान है|’ और वे सचमुच ही ग्राहक को अपना भगवान मानते भी थे| शायद यही कारण था कि एक बार जो कस्टमर इस होटल में आ जाता, वह दोबारा अन्य किसी स्थान पर नहीं जा पाता था। वह इस कार्य में समस्त स्टाफ को भी साथ लेकर चलते थे। उनका मानना था कि बड़े कार्य कोई व्यक्ति अकेला नहीं कर सकता, उसके लिए टीम वर्क की आवश्यकता होती है। अतः अपने स्टाफ में चाहे कोई वेटर हो, या कुक हो, चाहे कोई प्रबंधक हो या सफाई कर्मचारी, सब का ख्याल रखते थे और सबको साथ लेकर चलते थे। उनकी होटल की ख्याति बड़े-बड़े ऑफिसर से होते हुए सचिवालय के गलियारों तक पहुंच गई थी।
एक दिन सचिवालय से उन्हें मुख्यमंत्री के निजी सचिव का फोन आया कि अगले हफ्ते सोमवार के दिन मंत्री जी अपने सहयोगियों संग आपके होटल में रात्रि-भोज करेंगे| यद्यपि यह महेंद्र जी व उनके स्टाफ के लिए अत्यंत गर्व का विषय था, मगर साथ ही साथ एक चुनौती भी थी। अगर वे मंत्री जी की आशाओं की कसौटी पर खरे नहीं उतरे तो? होटल के प्रत्येक कर्मचारी की जान पे बन आई थी| क्या होउस-कीपिंग विभाग, क्या किचन प्रबंधन स्टाफ और क्या सफाई कर्मचारी सब के सब पर जैसे कोई आफत आ गई थी| निगम के कुछ कर्मचारी ऐसे भी थे, जिनके पास सारा दिन निठल्ला बैठ कर एस सर, नो सर करने के इलावा कोई अन्य काम न था| उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे क्या न करे|
बहरहाल, प्रत्येक कर्मचारी बिना थके, बिना रुके अपने अपने काम को इतने कुशलता से कर रहा था मानो मंत्री जी उसी का काम देखने आ रहे हो| इस आपाधापी में जो शख्स सबसे ज्यादा परेशान था वह था होटल का मुख्य प्रबंधक महेंद्र प्रताप सिंह| जिस दिन उन्हें यह सूचना मिली कि मुख्यमंत्री जी उनके होटल में रात्रि-भोज के लिए आ रहे हैं, उसी दिन से उनकी रातों की नींद उड़ गई थी| उन्होंने ध्यानपूर्वक अपने होटल का अवलोकन किया तो उन्हें कमियां ही कमियां नजर आई|
इन दिनों उन्होंने महसूस किया कि मानो वह किसी लड़की के पिता हो और मुख्यमंत्री दूल्हे राजा और उनके साथ आने वाला लाव-लश्कर जैसे बारात में आये हुए रूठे फूफाजी और मौसा जी | वे जानते थे कि दूल्हे व बारतियों को नाराज करना लड़की के पिता के लिए, कम से कम हिंदुस्तान में तो अक्षम्य अपराध है| उन्हेंने इस रात्रि- भोज को लेकर अपने स्टाफ के साथ अनेक मीटिंग्स की| एक मीटिंग के दौरान कनिष्ठ प्रबंधक ने सलाह दी कि भोज वाले दिन के लिए हमें साफ-सुथरी वर्दी में आना चाहिए तथा मंत्री जी नाराज ना हो जाए इसलिए प्रत्येक खिड़की दरवाजे के पर्दों को धुलवा लेना चाहिए| इतना ही नहीं सारे होटल में बिछे क्लीन को भी एक एक बार साफ करवा लेना चाहिए| मगर उन्होंने इससे भी दो कदम आगे बढ़कर काम किया| शायद वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे अत: सभी कर्मचारियों को चाहे वे प्रथम श्रेणी के मैनेजर थे या चौथी श्रेणी के वेटर, नई वर्दी जारी की की गई और सख्त हिदायत दी कि मंत्री जी के भोज वाले दिन नई वर्दी पहन कर ही आएं| यहाँ तक कि भोज से ठीक एक दिन पहले पूरे होटल के कालीन व पर्दे भी बदल दिए गए यानी कि मुख्यमंत्री की आवभगत में जरा सी भी चूक की गुंजाइश नहीं रखी गई| भोज में क्या-क्या बनेगा यह एक बहुत मुश्किल सवाल था स्टाफ के साथ कई मीटिंग्स की गई मंत्री जी के पी.ए. को कई बार फोन लगाया गया और मंत्री जी के के पसंद नापसंद के बारे में पूछा गया|
भोज वाले दिन महेंद्र जी सुबह सात बजे ही होटल में पहुंच गए थे| वे भाग-भाग कर सारा प्रबंध स्वयं देख रहे थे| पूरे होटल की सफाई की गई, डाइनिंग रूम के एक-एक मेज को नए मेज-पोश से सजाया गया| प्रत्येक मेज पर ताजे फूलों का एक एक गुलदस्ता रखा गया| रिसेप्शन पर तजा फूलों के गमले नर्सरी से खरीद कर रखे गए| उनकी एक टांग डायनिंग रूम में होती तो दूसरी रसोई में, कभी वे रिसेप्शन में जाते तो कभी सोफे कुर्सियों व पर्दों को चेक करते| उनको हेड ऑफिस से बार-बार मैनेजिंग डायरेक्टर के फोन आ रहे थे और पूछ रहे थे कि फलां काम कर लिया या नहीं...... इस बात का ध्यान रखना....... उस बात का का ध्यान रखना आदि| मैनेजिंग डायरेक्टर का फोन सुनकर महेंद्र जी और तनाव में आ जाते और फिर जिस कार्य को वे सावधानी पूर्वक कर चुके होते उससे दोबारा चेक करते| रसोई में जाकर वे कुक व वेटर को बार-बार हिदायत दे रहे थे कि उन्हें रात्रि भोज के लिए किन किन बातों का ध्यान रखना है| यद्यपि महेंद्र जी के पास कुशल स्टाफ था और यही स्टाफ आए दिन इस प्रकार के भोजों का आयोजन बड़ी कुशलता से करता रहा था फिर भी ना जाने क्यों महेंद्र जी इतना चिंतित थी उन्होंने भोजन के लिए बनाई गई एक-एक व्यंजन का निरीक्षण खुद किया ताकि कहीं नमक मिर्च ज्यादा ना हो जाए| भोज में इस्तेमाल होने वाली एक एक प्लेट चम्मच को भी उन्होंने स्वयं उलट-पुलट कर देखा ताकि कोई चूक न हो जाये|
मंत्री जी को रात आठ बजे आना था लेकिन होटल का स्टाफ शाम सात बजे ही उनके स्वागत हेतु फूलों के गुलदस्ते व हार लेकर खड़ा हो गया था| इन स्वागत कर्ताओं में होटल का समस्त प्रबंधक वर्ग तो था ही, हेड ऑफिस से मैनेजिंग डायरेक्टर भी एक बड़ा सा फूलों का गुलदस्ता लेकर मुख्य-स्वागत कर्ता के रूप में खड़े थे| जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, होटल स्टाफ की दिल की धड़कन भी बढ़ती जा रही थी सभी बार-बार कभी रिसेप्शन पर लगी हुई घड़ी को देख रहे थे तो कभी अपने वस्त्र विन्यास को| मैनेजिंग डायरेक्टर व अन्य प्रबंधक वर्ग गर्मी के दिनों में भी थ्री पीस कोट पहनकर अपनी टाई के नॉट को ठीक कर रहे थे| किसी तरह आठ बजे, सारे लोग उत्सुकता से मुख्यमंत्री के काफिले में सबसे आगे चलती हुई सिक्योरिटी की गाड़ी का सायरन सुनने लगे| सभी लोग एकदम चौकन्ने हो गए, मगर यह क्या, ये तो घड़ी के पेंडुलम का सायरन था| धीरे धीरे साड़े आठ बज गए, पर मंत्री जी की गाड़ी के सायरन की मधुर धुन नहीं बजी| कहते हैं इंतजार की घड़ियां लंबी होती हैं, मैनेजिंग डायरेक्टर अपना सारा गुस्सा महेंद्र जी पर निकाल रहे थे तथा बार-बार आदेश दे रहे थे कि मंत्री जी के पी.ए. का फोन लगाओ और पता करो कि देरी का कारण क्या है| परंतु नेटवर्क तो नेटवर्क है उससे क्या मालूम कि फोन लगाने वाला किसी होटल का मैनेजिंग डायरेक्टर है तथा जिस व्यक्ति को फोन लगाया जा रहा है वह मुख्यमंत्री का पी.ए. हैं| फोन तटस्थ होकर बिना किसी पूर्वाग्रह के जवाब देता, “जिस व्यक्ति से आप बात करना चाह रहे हैं वह अपका फोन उठा नहीं दे पा रहे हैं, कृपया थोड़ी देर बाद कोशिश करें|” कभी बड़े ही सोम्य स्वर में दुर्लभ रहस्य का पर्दाफाश करते हुए कहता, “फोन नेटवर्क कवरेज क्षेत्र से बाहर है, कृपया थोड़ी देर बाद बात करें|” हर बार एक ही बात सुन सुनकर एम.डी. साहिब बुरी तरह नाराज हो गये फिर अचानक मंत्री जी के पी.ए.का फोन लग ही गया मगर हद तो तब हो गई जब फोन किसी युवती ने उठाया और अत्यंत मधुर स्वर में बोली, “क्षमा कीजिये मंत्री जी इस समय अत्यंत जरूरी मीटिंग में हैं, मैं आपकी बात उनके पी.ए. से करवाने की कोशिश करती हूँ, मगर इसके लिए आपको थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा, क्योकि इस समय वे भी मंत्री जी के साथ मीटिंग-हॉल में हैं|” इतना कह कर उस युवती ने बिना कोई जवाब सुने फोन काट दिया| अब तो मैनेजिंग डायरेक्टर के सब्र के सारे बांध टूट गए| आज तक सब लोग उनका इंतजार करते थे, मगर आज पहली बार वे किसी व्यक्ति का इंतजार कर रहे थे, वह भी हाथों में फूलों का गुलदस्ता लेकर| दो-चार मैंनेजर और वेटर उनके पास ही खड़े थे, जो एम.डी.साहिव को बार-बार बिसलेरी का पानी और जूस पिला रहे थे|
पंजाबी भाषा की एक कहावत ‘बेला नाई कुत्ते दी हजामत’ यानी यदि नाई के पास कोई काम करने को ना हो तो वह कुत्ते की ही हजामत करने लगता है, यहाँ शत प्रतिशत चरितार्थ हो रही थी| क्योंकि कुछ लोग बिना वजह ही कभी डाइनिंग टेबल पर पड़े हुए फूलों के गुलदस्ते को ठीक करने का उपक्रम कर रहे रहे थे तो कोई बंद पर्दों को ही सलीके से बंद कर रहा था| कुक बार-बार अपने द्वारा बनाये हुए गर्म खाने की गर्माहट को चैक कर रहा था| वेटर सलीके से रखी हुई कराकरी को दोवारा सलीके से रख रहे थे | फोटोग्राफर प्रबंधकों की कई फ़ोटो लेने का बाद खाली दीवारों पर ही अपने प्रोफेशनल कैमरे की आजमाईश कर रहा था| समय बहुत धीमे-धीमे, मगर अनवरत चलता रहा| नो बजे.... साड़े नो बजे..... दस बजे..... और फिर साड़े दस भी बजे गए| दस बजकर पैंतीस मिनट पर फ़ोन की घंटी किसी मधुर गीत सी गुनगुना उठी| महेंद्र जी ने फोन यू उठाया जैसे खोई हई दुर्लभ वस्तु मिल गई हो| मंत्री जी के पी.ए. का फोन था| महेंद्र जी ने जिस तत्परता से फोन उठाया उतनी ही तत्परता से फोन रख भी दिया| पी.ए. ने अपनी व्यस्तता के लिए क्षमा मांगते हुए बताया, “महेंद्र भाई, दिल्ली से कुछ अति विशेष लोग आ गए थे, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता था, अतः मंत्री जी ने खाना अपने आवास पर ही खा लिया, आपके होटल का खाना शायद आज हमारे भाग्य में नहीं था खैर जैसी प्रभु इच्छा|”
अगले रोज, सब कुछ सामान्य था| सब एक दुसरे को देख कर हंस रहे थे| कुछ एक दुसरे की नक्कल उतार कर बता रहे थे कि मुख्यमंत्री के रात्रि- भोज वाले दिन उसकी स्थिति कैसी थी| कुछ लोग जो ज्यादा ही निर्भीक थे, मैनेजिंग डायरेक्टर की नक्कल उतार कर हास्य रंग में सरोवार थे| जिस बात पर स्टाफ सबसे ज्यादा मज़े ले रहा था वह थी, गर्मी के मौसम में प्रबंधको द्वारा थ्री-पीस सूट व टाई पहन कर दो-तीन घंटे मंत्री जी का इंतजार करना| कुछ वरिष्ठ प्रवन्धक इस बात के लिए गमगीन थे कि देश के इतने बहुमूल्य साधन मंत्री जी की व्यस्तता को भेंट चढ़ गए, क्या हमारा देश इतनी फ़जूल-खर्ची बर्दाश्त कर सकता है? मगर महेंद्र जी अब भी प्रसन्न व उत्साहित थे| उन्होंने स्टाफ को समझाया कि कोई बात नहीं, इस बहाने पूरे होटल की काया-कल्प हो गई| आप लोगो को भी न केवल अपनी शक्तियों का एहसास हो हुआ अपितु आप सबका काम भी अपडेट हो गया| कुछ दिन तो इस भोज को लेकर खूब चर्चा हुई परन्तु वक्त के पास तो सभी जख्मों की दवा है| धीरे-धीरे सारा स्टाफ इस रात्रि–भोज की परेशानी व बेचैनी को भूल गया
लगभग चार महीने बाद फिर सचिवालय से फ़ोन आया कि मुख्यमंत्री जी रात्रि-भोज के लिए उनके होटल में पधार रहे हैं| जाहिर है इस बार पिछले अनुभव को देखकर न तो किसी को कोई ख़ुशी हुई और न ही कोई उत्सकता| लेकिन महेंद्र जी एक बार पुन: उतनी ही बेचैनी से गुजरे जितनी बेचैनी से पहले गुजरे थे| एक बार फिर सभी कर्मचारियों को उनके पद के अनुरूप, नई वर्दी जारी की गई| एक बार फिर पुरे होटल की सफाई की गई| फर्श के कालीन को बदला गया, पर्दो को बदला गया। मेज़-कुर्सिओ की अदला-बदली की गई| पहले की भांति ही रिसेप्शन पर तजा फूलों के गमले नर्सरी से खरीद कर रखे गए| प्रत्येक मेज पर ताजे फूलों का गुलदस्ता रखा गया।
सामान्य दिनों में महेंद्र जी, कुक को कोई विशेष व्यंजन बनाने के लिए केवल हुक्म देते थे मगर यहां बात मुख्यमंत्री जी की थी, अत: वे स्वयं रसोई में खड़े होकर अपनी आंखों के सामने सारे व्यंजन तैयार करवा रहे थे। संक्षेप में इस बार फिर उनकी एक टांग रसोई में थी तो दूसरी रिसेप्शन में। कभी मंत्री जी के पी.ए. का फोन सुनते तो कभी अपने मैनेजिंग डायरेक्टर का। सारे के सारे लोग उन्हें फोन पर हिदायत पर हिदायत दे रहे थे, मंत्री जी का पी.ए., मन्त्री जी पसंद न पसंद व अन्य रूचियों की जानकारी दे रहा था तो एम. डी. साहिब बार-बार महेंद्र जी को याद दिला रहे थे कि आज होटल की इज्जत उनके हाथों में है। खैर महेंद्र जी ने शांत मन से मगर सावधानीपूर्वक एक-एक काम को करीने से अंजाम दिया|
रात को सात बजते ही एम.डी. साहब पहले की भांति अपनी टीम के साथ मुख्यमंत्री का स्वागत करने बड़े-बड़े गुलदस्ते लेकर पहुंच गए। इस बार मंत्री जी भी निराश नहीं किया अपितु पूर्व निर्धारित समय पर अर्थात ठीक रात आठ बजे अपने समस्त लाव-लश्कर के साथ होटल पहुंच गए। होटल-स्टाफ ने एम.डी. साहिब की अगवानी में, पूरे जोश के साथ मंत्री जी का स्वागत किया। मंत्री जी को इतने हार पहनाये गए कि उनका कंठ हारों से भर गया। मंत्री जी के पी.ए. ने सारे हार उनके कंठ से उतार कर उनकी कार में लगे हुए झंडे के डंडे पर ऐसे चड़ा दिए जैसे स्वागत के हक़दार मंत्री जी न होकर उनकी कार हो|
मगर इस सब उपक्रम में महेंद्र जी सबसे पीछे खड़े होकर डाइनिंग हॉल में वेटर्स को आदेश दे रहे थे। यद्यपि किचन स्टाफ ने तरह-तरह के व्यंजन बनाए थे, मगर मंत्री जी ने सादे ढंग से, बहुत कम व हल्का-फुल्का भोजन लिया| एमडी व अन्य प्रबंधकों ने मंत्री जी को बहुत से व्यंजन खिलाने की कोशिश की मगर सब व्यर्थ| अंत में मंत्री जी ने पानी मांगा तो सबसे सीनियर वेटर ने बड़ी अदा के साथ मंत्री जी को पानी दिया| पानी का एक घूंट भरते ही मंत्री जी नाराज होते हुए बोले, “अरे ! यह तो ठंडा है|” अपने पी.ए. से मुखातिब होकर रोब से बोले, “त्रिपाठी जी तुम भी क्या करते हो, तुमने होटल - स्टाफ को बताया नहीं था कि मैं आजकल केवल गर्म पानी ही पीता हूं, यहां का मैनेजर कौन है?” मंत्री जी ने एक ही सांस में कई प्रश्न एक साथ दाग दिए| महेंद्र जी की तो जान ही सूख गई| उन्होंने तुरंत गर्म पानी मंगवाया तथा मंत्री जी के क्रोध को गर्म पानी पिला कर ठंडा किया | गल्ती करने वाले वेटर को अच्छी-खासी झाड़ लगाई गई|
इतने में एक कनिष्क प्रबंधक मिस्टर टहल जो मुश्किल से अंग्रेजी के तीन शब्द जानता था ‘यस सर’... नो सर... और थैंक्यू सर|’ एक प्लेट में थोड़ी सी खीर डालकर मुख्यमंत्री के पास आ खड़ा हुआ और नब्बे डिग्री के कोण में झुककर अत्यंत आत्मीयता से बोला, “सर स्वीट-डिश में यह खीर ट्राई करें|” “नहीं नहीं मैं मीठा वैसे भी पसंद नहीं करता और अब तो मैं पहले ही ओवर हो चुका हूं|” मंत्री जी ने तुरंत जवाब दिया| मगर मिस्टर टहल और भी मधुरता से बोला, “सर यह खीर हमारे होटल की स्पेशलिटी है, भले ही एक चम्मच लीजिए, पर आपको खानी अवश्य पड़ेगी|” मंत्री जी ने मुस्कुराते हुए एक चम्मच खीर खा ली और मिस्टर टहल की पीठ थपथपाते हुए बोले, “वेल्डन आपके होटल का खाना बहुत अच्छा था|” इतना कहकर मंत्री जी अपने लाव-लश्कर समेत होटल से चलें गए|
मंत्री जी ने आने में जितना समय लगाया था, जाने में पांच मिनट भी नहीं लगे| उनकी गाड़ी पहले ही होटल के गेट से सट कर खड़ी थी| चालक गाड़ी स्टार्ट कर सीट पर बैठा हुआ था और सुरक्षा गार्ड पिछली सीट का दरवाज़ा खोल कर मंत्री जी का इंतजार कर रहा था| उनका बस चलता तो गाड़ी को भोजन-कक्ष तक ही ले जाते मगर बीच में होटल की कांच की दीवार आ गई| खैर मंत्री जी ने जैसे ही गाड़ी में कदम रखा, शोर मचाता हुआ उनका काफिला, मिनटों में आँखों से ओझल हो गया| क्योंकि जाते समय मंत्री जी प्रसन्न थे तथा एक मीठी टिप्पणी के साथ विदा हुए थे, इसलिए होटल का प्रत्येक सदस्य यहां तक कि एम.डी. साहिब भी मिस्टर टहल के होंसले की तारीफ कर रहे थे| मिस्टर महेंद्र अभी भी वेटर से इस बात का पता लगाने में उलझे हुए थे कि मंत्री जी को गर्म पानी के स्थान पर ठंडा पानी कैसे चला गया|
अगले रोज हेड ऑफिस से होटल में दो आदेश आए थे| पहले आदेश में श्री महेंद्र प्रताप सिंह का स्थानांतरण शिमला से कई सो किलोमीटर दूर डलहौजी कर दिया गया था और दूसरे आदेशानुसार मिस्टर टहल को शिमला होटल का कार्यभार स्वतंत्र रूप से सोंप दिया गया था|
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