निर्जीव होने से पहले
बड़ा भयानक दृश्य
हो जाता है युद्धभूमि से
जब एक मासूम बच्चा
रो रोकर युद्ध रोकने की
गुहार लगाता है
सारी दुनिया से।
गोरा रंग, बाल बिखरे
निस्तेज हुई आँखें
व्याकुल हुआ भूख से।
कोई नहीं, वह अकेला पड़ा
सारा शहर खंडहर हुआ।
माँ उसकी कहीं,
मलबे नीचे दबी पड़ी
वतन के खातिर
पिता शहीद हुए कहीं।
आह! कितनी भयंकर पीड़ा
आदमी, आदमी को देता है।
यह कैसा विकास है जो
आदमी, आदमी के लिए
दिन रात करता है रहता है।
नहीं चाहिए ऐसा विकास,
नहीं चाहिए ऐसा संत्रास।
रोको जितनी जल्दी हो सके
विकास की लड़ाई को
बचालो सजीव को
निर्जीव होने से पहले।
संजय पवार
पुणे

