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नूतन और देवानन्द यानि फिल्म काला की दो धाराओं का मिलन

दिलीप कुमार

देखो रूठा न करो

दिलीप कुमार

लेखक   

“तेरे घर के सामने” एक कॉमेडी, रोमांटिक फिल्म है.जो सामाजिक संदेश भी दे जाती है कि “जो कुछ नया है वह बुरा नहीं है, न ही वह सब कुछ पुराना अच्छा है”कहानी एक युवा आर्किटेक्चर राकेश (देवानंद) की है, जो पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारत लौटता है.  उसे एक आधुनिक भारतीय लड़की सुलेखा (नूतन) से प्यार हो जाता है, जो भारतीय संस्कृति और अपने माता-पिता की इच्छाओं का सम्मान करती है. उन दोनों के पिता परस्पर एक – दूसरे के जानी दुष्मन होते हैं.  कभी भी झगड़ना बंद नहीं करते. उन दोनों के लिए अपने अपने – अपने पिता को समझाने के ज़िम्मेदारी रहती है, कि अपने मतभेदों को दूर करिए सद्भाव में रहने के लिए मनाने की होती है. जिससे वो दोनों परस्पर एक – दूसरे को हासिल कर सकें.

“तेरे घर के सामने”  फिल्म एक रोमांटिक, कॉमेडी फिल्म हैं, यूँ तो देव साहब रोमांस, कॉमेडी, व्यंगात्मक, थ्रिलर, संजीदगी आदि अभिनय शैली में माहिर थे. वहीँ नूतन उनके बिल्कुल उलट थीं. नूतन अभिनय के लिहाज से संजीदगी, दुख, दर्द, सशक्त अभिनय शैली में उनका कोई सानी नहीं था. वो एक सशक्त अभिनेत्री थीं, उनको कभी भी अपनी फ़िल्मों में हीरो की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी. वो खुद एक मुक्कमल हीरो – हीरोइन का कंप्लीट पैकेज थीं. वो जब भी पर्दे पर आती थीं छा जाती थीं. उन्होंने अधिकांश खुद पर केंद्रित फ़िल्मों में काम किया, और सफल हुईं. उस दौर में मीना कुमारी, नूतन ये दो ऐसे नाम थे, जिनको कभी भी हीरो की आवश्यकता नहीं हुई.

“पेएंग गेस्ट, मंज़िल, बारिश” आदि फिल्मों के बाद देव साहब नूतन एक बार फिर पर्दे पर आए. देव साहब की मूल शैली रोमांटिक है, वहीँ नूतन सशक्त महिला वाली हिरोइन फिर भी फिल्म में देव साहब एवं नूतन की केमिस्ट्री देखने लायक होती है. बात – बात पर नखरे करती नूतन और ऐसे ही उनको मानते देवानंद फिल्म देखते ही बनती है. रोमांटिक भूमिकाओं में देव साहब का आजादी के पहले से आज तक कोई सानी नहीं है कहते हैं कि उनसे अच्छा रोमांस कोई कर ही नहीं सकता. तेरे घर के सामने फिल्म में नूतन जितनी बार रूठती हैं उतनी बार देव साहब मानते हैं यह देखते हुए सबसे ज्यादा मज़ा आता है.

देव साहब एक बार इंटरव्यू में कहते हैं कि मैं अगर नूतन के साथ रोमांस कर सकता हूं, तो मैं मान सकता हूँ कि मैं रोमांस कर लेता हूं. देव साहब कहते हैं कि रोम – रोम में मेरे रोमांस है मैंने अपनी जिंदगी के साथ भी रोमांस किया है, जैसे उन्होंने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विथ  लाइफ” में में बताते हैं. क्यों कि नूतन बहुत सख्त स्वभाव की थीं, कई बार हीरो के साथ नूतन गुस्सा हो जाती थीं, मैंने एक मैग्जीन में पढ़ा था कि नूतन ने एक बार ग्रेट संजीव कुमार को तमाचा मार दिया था. वहीँ नूतन भी कहती थीं कि एक हीरो ऐसा है कि आपको उनका चेहरा देखकर गुस्सा आ ही नहीं सकता, बल्कि आपकी गुस्सा उनको देखकर गायब हो जाती है, आपको  आएगा तो सिर्फ प्यार….

देव साहब किसी भी ऐक्ट्रिस के साथ फिट बैठते हैं, लेकिन रोमांस में वहीदा रहमान, मधुबाला, सुचित्रा सेन, हेमा मालिनी, वैजयंती माला, आशा पारिख, साधना, आदि के साथ पर्दे पर रोमांस किया सबसे ज्यादा मजा आता है मधुबाला जी एवं देव साहब की केमिस्ट्री देखकर क्यों कि दोनों खुशमिजाज थे. एक कहावत प्रचलित थी कि दुनिया की सबसे हसीन महिला मधुबाला, वहीँ सबसे खुशमिजाज हैंडसम देव साहब थे.

फिल्म “बंबई का बाबू” फिल्म में मधुबाला जी को कास्ट करना था जैसे ही उनको पता चला कि उसमे देव साहब की बहन बनना पड़ेगा उन्होंने साफ मना कर दिया कि मैं क्यों दुनिया के सबसे खुशमिजाज हैंडसम आदमी की बहिन बनूँ, देवानंद की ऐसी छवि थी. फिर भी मुझसे जितनी बार बोल जाए कि देव साहब को पर्दे पर सबसे ज्यादा किसके साथ देखना पसंद करोगे तो मैं हर बार नूतन का नाम नाम लूँगा.

देव साहब फिल्म में मज़ाक – मज़ाक में एतिहासिक पंचशील समझौता को अपने प्रेम से जोड़कर नूतन को समझा देते हैं. वहीँ प्रेम को हासिल करने के लिए चीनी – भारतीय तरीका समझा देते हैं. फिल्म एक मिनट के लिए भी बोर नहीं करती “सचिन देव बर्मन”  उर्फ बर्मन दादा का संगीत जिसके गाने “हसरत जयपुरी” ने लिखे एक से बढ़कर एक संगीत मोहम्मद रफ़ी ने देव साहब के लिए तीन एकल और लता मंगेशकर के साथ दो और युगल गीत गाए. आशा भोसले भी एक गाना गाती हैं. “दिल की मंजिल”, जो एक कैबरे गाना है.  “दिल का भंवर” “तेरे घर के सामने” “देखो रूठा ना करो” सहित कई कालजयी गीत हैं, मुझे लगता है ये रफी साहब के जीवन के सबसे प्रमुख गीतों में से एक होंगे, एक – एक गीत आज भी गाया और सुना जाता है.. यह फिल्म देखना वाकई सुकून देह रहा..

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