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नवांकुर साहित्य सभा : ‘काव्यान्कुर 8’ और ‘ज़िन्दगी मुस्कुराएगी’ का लोकार्पण

नई दिल्ली : देश के नव-कलमकारों को काव्य के क्षेत्र में प्रोत्साहन हेतु समर्पित संस्था नवान्कुर साहित्य सभा ने नवान्कुर काव्य पाठ और पुस्तक लोकार्पण समारोह आयोजित किया। समारोह में बहुप्रतीक्षित नवान्कुरों के लिए प्रकाशित श्रंखला में आठवीं पुस्तक ‘काव्यान्कुर 8’ तथा संस्था के संस्थापक अध्यक्ष श्री अशोक कश्यप की दूसरी पुस्तक ‘ज़िन्दगी मुस्कुराएगी’ का…

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मां मेरी यह कहती है…

—- डॉ शिल्पी बक्शी शुक्ला मां मेरी यह कहती है, जिन पेड़ों पर फल लगता है, उनकी शाखें झुक जातीं हैं, करने प्रणाम अस्‍ताचल सूर्य को, बहती नदियां रूक जातीं हैं, गिरती हैं लहू की बूंदे तो, बंजर धरती भी सोना हो जाती है, सहती है बोझ ये धरती, तभी ये सृष्टि चल पाती है,…

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जिंदगी इतनी आसान नहीं…

डॉ शिल्पी शुक्ला बक्शी जि़दगी इतनी आसन नहीं, जितनी नज़र आती है, घना कोहरा हो, या आँधी, रोज़ी-रोटी की तलाश, घर से बाहर ले आती है, तपती है, गलती है देह, सभी मौसमों में, तभी गरीब के पेट की, आग बुझ पाती है, बेबस चेहरों पर फिर भी , सुंदर मुस्‍कान नज़र आती है, मिट्टी…

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इक प्रेम कहानी

डॉ. शिल्पी बक्शी शुक्ला अंबर से बरसता ये पानी, कहता है, अजब कहानी । हमने न सुनी थी, पर अंबर ने अपने आंसुओं से बुनी थी । तुमने न कही थी, पर इसकी पीड़ा हर पल धरा ने सही थी । सदियों से चलती, इक प्रेम कहानी, किसी फकीर की ज़बानी ।  कुछ जानी-कुछ अनजानी,…

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कविता : नैतिकता

कवि- जी. पी.वर्मा नबाबों के शहर- लखनऊ में- एक लड़की ने- कैब ड्राइवर पर हाँथ- क्या उठाया- गूँगी नैतिकता – चीख उठी! कार्यवाही की-  कांव कांव हुई! ट्वीट मिमियाने लगे!! पर नैतिकता तब- निरीह -मौन- शरमाई रहती जब मर्द- किसी औरत को – सड़को पर- दौड़ा दौड़ा डंडों से- पीटता, वो गिड़गिड़ाती मदद मांगती!! शायद,पिटना…

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कविता : प्रेम का नाजुक ख्याल

कवि : जी पी वर्मा प्रेम का नाज़ुक-ख़याल!बेबाकी से-सप्त स्वरों की-झंकार सा –नीलाम्बर मे-झिलमिल-तारा किरणों की-अटूट पाँति सा लहराए!धरा से नभ-नभ से ब्रह्मांड तक-हर तरफ गहराए!!मेरे, तुम्हारे –हम सबके लिए –जीवन वंशी-नफरत नहीं-प्रेम गीत गाए-इंद्रधनुषी छटा बिखराये-तो कितना अच्छा हो!!!

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कविता : नि:शब्द

प्रियरंजन पाढ़ी की दो कवितायें निशब्द हैं सब, उपवन, समीर, विहग जब, तुम क्या करते हो तब? नहीं सोचते उनको क्या? पीड़ा विगत दिनों की, उभर आती मस्तक पर बन स्वेद कण, मस्तिष्क में दबी स्मृतियां, रहती हैं ज्यों की त्यों, तुम नहीं सोचते उनको क्या? जब होता है निशब्द अधूरी अनकही बातों को तलाशते,…

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कविता : प्रेम…

डॉ जया आनंद प्रेम पाना आसान है इसके लिए अहं को कूटना पीसना है बस थोड़ा सा सरल होना है ….और सरल होना शायद! कितना कठिन !!! …पर मेरे लिए नहीं, कबीर को थोड़ा तो समझा ————————— 2. प्रेम आत्मा को उज्ज्वल करता हुआ विस्तार देता है संकुचन नहीं, विचारों को परिष्कृत करता हुआ उदार…

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अबकी आना तो …

सीमा सिंह कि दो कवितायें … घाट की सीढ़ियों पे छोड़ आये थे  जो अधूरा दिन  चलो न उसे पूरा करते हैं  !  सुनो  ! अबकी आना  तो इतवार की दोपहरी का  इत्तमनान भी लेकर आना   ,  ढूँढनी है मुझे इस बार  चुप्पियों में छिपी संभावनाएँ  ,  मौन के उस पार जो एक तुम…

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