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मां मेरी यह कहती है…

— डॉ शिल्पी बक्शी शुक्ला मां मेरी यह कहती है, जिन पेड़ों पर फल लगता है, उनकी शाखें झुक जातीं हैं, करने प्रणाम अस्‍ताचल सूर्य को, बहती नदियां रूक जातीं हैं, गिरती हैं लहू की बूंदे तो, बंजर धरती भी सोना हो जाती है, सहती है बोझ ये धरती, तभी ये सृष्टि चल पाती है,…

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जनता की जय-जयकार, वोट की दरकार

मनीष शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार जनता एकबार फिर जनार्दन है। चारों ओर उसकी जय जयकार हो रही है। चाहे कोई राजनीतिक दल हो या फिर नेता आजकल सपने में भी सारे मिलकर जनता का गुणगान गा रहे हैं। दिन हो रात, हर पल नेता जी जनता की सेवा में खुद को बिजी बता रहे हैं। मरहम…

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नवांकुर साहित्य सभा : ‘काव्यान्कुर 8’ और ‘ज़िन्दगी मुस्कुराएगी’ का लोकार्पण

नई दिल्ली : देश के नव-कलमकारों को काव्य के क्षेत्र में प्रोत्साहन हेतु समर्पित संस्था नवान्कुर साहित्य सभा ने नवान्कुर काव्य पाठ और पुस्तक लोकार्पण समारोह आयोजित किया। समारोह में बहुप्रतीक्षित नवान्कुरों के लिए प्रकाशित श्रंखला में आठवीं पुस्तक ‘काव्यान्कुर 8’ तथा संस्था के संस्थापक अध्यक्ष श्री अशोक कश्यप की दूसरी पुस्तक ‘ज़िन्दगी मुस्कुराएगी’ का…

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आगमन संगोष्ठी : ‘हमारी आँख का पानी कहीं पत्थर न हो‌ जाये…’

लखनऊ एक्सपो 2021 में रेखा रावत बोरा के संयोजन में आगमन की संगोष्ठी लखनऊ एक्सपो 2021 में मुनाल उत्तरांचल पूर्वांचल कला उत्सव के तहत आयोजित गोष्ठी में कवियों ने शब्दों के रंग बिखेरे। आगमन संस्था की  राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा रावत बोरा के संयोजन में आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि रूहेलखंड व आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति…

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कहानी : वैशाली ने बदल दी तकदीर

लेखक : मनीष शुक्ल रात भर वो इधर से उधर करवट बदलती रही। आने वाली सुबह उसके संघर्ष से भरे जीवन का अंत कर सकती थी। उसके जीवन में खुशियाँ भर सकती थीं। एक ओर संघर्ष से घिरी अंधेरी ज़िंदगी दूसरी ओर रोशनी से भरा भविष्य, लेकिन फैसला लेना आसान नहीं था… बस एक फासले…

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मां मेरी यह कहती है…

—- डॉ शिल्पी बक्शी शुक्ला मां मेरी यह कहती है, जिन पेड़ों पर फल लगता है, उनकी शाखें झुक जातीं हैं, करने प्रणाम अस्‍ताचल सूर्य को, बहती नदियां रूक जातीं हैं, गिरती हैं लहू की बूंदे तो, बंजर धरती भी सोना हो जाती है, सहती है बोझ ये धरती, तभी ये सृष्टि चल पाती है,…

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जिंदगी इतनी आसान नहीं…

डॉ शिल्पी शुक्ला बक्शी जि़दगी इतनी आसन नहीं, जितनी नज़र आती है, घना कोहरा हो, या आँधी, रोज़ी-रोटी की तलाश, घर से बाहर ले आती है, तपती है, गलती है देह, सभी मौसमों में, तभी गरीब के पेट की, आग बुझ पाती है, बेबस चेहरों पर फिर भी , सुंदर मुस्‍कान नज़र आती है, मिट्टी…

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इक प्रेम कहानी

डॉ. शिल्पी बक्शी शुक्ला अंबर से बरसता ये पानी, कहता है, अजब कहानी । हमने न सुनी थी, पर अंबर ने अपने आंसुओं से बुनी थी । तुमने न कही थी, पर इसकी पीड़ा हर पल धरा ने सही थी । सदियों से चलती, इक प्रेम कहानी, किसी फकीर की ज़बानी ।  कुछ जानी-कुछ अनजानी,…

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व्यंग्य : भैंसे की व्यथा कथा

संजीव जायसवाल ‘संजीव’ आ. सम्पादक जी, सादर प्रणाम, मैं कालू राम अध्यक्ष, अखिल भारतीय भैंसा संघ इस पत्र के माध्यम से अपने भैंसा समुदाय की व्यथा कथा सुनाना चाहता हूँ. इस देश में रंगभेद की कुरीति का सबसे बड़ा शिकार हम लोग ही हुए है लेकिन किसी ने भी कभी हमारी कोई सुध नहीं ली….

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लघु कथा : मेरे साहिर…

पवन जैन सडक की तरफ खुलती बालकनी , डूबता सूरज , अदरक की चाय और कारवां पे चलते मेरे पसंदीदा गीत ..कहने को ये मेरे बेहद सुकून के पल होते हैं ..ऑफिस से घर लौटते लोग ,सभी को जल्द से जल्द घर पहुँचने की जल्दी ..जहाँ उनका कोई इन्तिज़ार कर रहा होता है . अक्सर…

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