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महिला सम्मान पर ‘हमला’ करते विज्ञापन

लेखक : डॉ आलोक चांटिया

भारतीय टेलीविजन में दिखाए जाने वाले विज्ञापन लगातार महिला की गरिमा सम्मान के विरुद्ध करते हैं कार्य और दिखाते हैं महिला के मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का गलतफहमी अपने को देशभक्त बताने वाले और महिलाओं के नाम पर पैडमैन जैसी पिक्चर बना कर सुर्खियां बटोरने वाले अक्षय कुमार के पुरुषों के अंडर गारमेंट के विज्ञापन मे दिखाए जाते हैं जिसमें जब  एयरपोर्ट पर कस्टम अधिकारी उनको पूछती है कि डालर कहां है तो अपनी बुद्धि का परिचय देते हुए श्रीमान अक्षय कुमार अपने अंडर गारमेंट को दिखाते हैं कि कलर यहां हैं उसके बाद और अधिक सोचनीय स्थिति वाला विज्ञापन आगे बढ़ता है और वह सक्षम अधिकारी अपने बाल खोलकर एक उन्मुक्त अवस्था में कहती है फिट है बॉस क्या वास्तव में महिला सिर्फ पुरुषों के अंडर गारमेंट सीखने के लिए पागल रहती है यही नहीं दूसरा विज्ञापन और कमाल करता है जिसका नाम है माचो स्पोर्टो व्हाट इस विज्ञापन में भी यह दिखाया गया है कि पुरुष के अंडर गारमेंट को देखने के लिए योग शिक्षिका महिला इतनी बेचैन रहती है विवाह योग कराते समय गिनती की संख्या बढ़ाकर पुरुष को उसी स्थिति में देखने के लिए रखती है इसके अलावा जब बात नहीं बनती है तो वह उसकी चटाई को ऊपर रख देती है और जब पुरुष का अंडर गारमेंट दिखाई देता है तो बहुत खुश होती है क्या वास्तव में महिलाएं ऐसा ही सोचते हैं और यदि ऐसा है तो फिर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का क्या महत्व है जो गरिमा पूर्ण जीवन सम्मान पूर्ण जीवन को मूल अधिकार बताता है क्या यह मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं है यही नहीं भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व में प्रत्येक नागरिक के कर्तव्य के रूप में अपेक्षा की गई है कि वह महिला के सम्मान के लिए कार्य करें उसकी गरिमा के लिए कार्य करें अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि निर्देशक तत्व पर भी न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है देश में महिलाओं के लिए कानून के मकड़जाल बनाए गए उसके बाद भी टीवी चैनल पर एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा जिस तरह के पूर्ण विज्ञापनों को अनुमति दी जा रही है जो भारत सरकार का एक निकाय है उसे क्या प्रदर्शित होता है कि महिला को सिर्फ भोग की वस्तु बन जाता बनाया जा रहा है क्या महिलाओं को स्वयं इसका विरोध नहीं करना चाहिए क्या हम सब ऐसे ही महिला का सम्मान करेंगे और महिला दिवस मनाएंगे मानव ने संस्कृति बनाकर अपने तन को कपड़े से ढक कर यह बात प्रदर्शित की थी कि वह जानवरों से अलग है लेकिन आज कपड़ों के उतारने को ही आधुनिकता से जोड़कर जिस तरह देखा जाने लगा है उससे संस्कृति पर नासिर प्रश्नचिन्ह लगा है बल्कि हम फिर से जानवर की तरह प्राकृतिक जीवन जीने की ओर अग्रसर हो गए हैं और इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है विज्ञापन और यही एक विमर्श का सबसे बड़ा विषय होना चाहिए कि हम चाहते क्या हैं|  

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