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राज किरण की दास्तान : गुमनाम, गुमराह, गुमशुदा हो गया नामचीन कलाकार

लेखक : दिलीप कुमार

ये अभिनेता राज किरन हैं, 80 के दशक में लगभग हर बड़ी फिल्म का हिस्सा होते थे..  सहायक हीरो होते हुए भी अपनी आकर्षक पर्सनैलिटी से दर्शकों को आकर्षित करते थे. कला एवं व्यापारिक दोनों तरह की फ़िल्मों में काम करते थे. अर्थ फिल्म में विपत्तियों से घिरी शबाना आज़मी को समझाते हुए उन्हें अवसाद से निकाल कर ले आते हैं. राज किरन को कौन भूल सकता है…

जब भी थोड़ा संजीदा मौसम होता है, तो जगजीत जी की यादगार मार्मिक गजलें याद आती है.. ऐसे ही एक है ” झुकी झुकी सी नज़र बेरकरार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं”… यह ग़ज़ल उनके ऊपर ही फिल्माई गई है.. बरबस ही राज किरन याद आते हैं.. और ज़िन्दगी ने जैसे उनके साथ खेल खेला तो लगता है यह ग़ज़ल उन्हीं के लिए बनाई गई है.

कहते हैं कि राज किरन के ऊपर जब विपत्ति आई तो खुद को नहीं समझा सके… वैसे भी दूसरों की बजाय खुद को संभालना मुश्किल होता है. एक दौर था जब राज किरण की फिल्मों में खूब डिमांड थी. अफ़सोस वो भी दौर आया जब अभिनेता को काम के लाले पड़ गए.  उनके परिवार ने उनकी सारी संपत्ति हड़प ली . राज को सिनेमा से सिर्फ़ रुसवाइयां मिलीं और फिर परिवार का धोखा, ये सब राज किरण बर्दाश्त नहीं कर पाए, वो मानसिक अवसाद के शिकार हो गए.  इसी दौरान वो हर किसी से दूर हो गए, उनके बारे में लोगों को कोई जानकारी नहीं. लगभग 26 साल हो गए आजतक कोई पता नहीं है. ज़िन्दा हैं या दुनिया छोड़ गए…

ऋषि कपूर राज के अच्छे मित्र थे, उन्होंने उनके बारे में पता करने की कोशिश की. पता चला कि राज किरण अमेरिका के पागलखाने में हैं.  दीप्ति नवल ने भी राज किरण को लेकर चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया था “उन्होंने अमेरिका में राज को टैक्सी चलाते हुए देखा था ! अब सवाल यह है  कि जिस आदमी के पास पैसे न हो मानसिक रूप से सक्षम न हो वो फॉरेन कैसे पहुंच सकता है? जो भी हो सच कौन जाने… पता नहीं कितनी सच्चाई है. बुरे वक़्त में उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर फॉरेन चली गईं.. इसीलिए कहते हैं, जो भी करिए खुद को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए रखें, क्योंकि कि इस निरंकुश दुनिया में दौलत के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है. वैसे भी अब निभाने की परंपरा खत्म हो चली है. हिन्दी सिनेमा भी अज़ीब सी दुनिया है.. न जाने ऐसे कितने सितारे हैं, जो आगे बढ़ चुकी दुनिया में एक कोने में पसमांदा हैं.. केवल सिनेमा ही नहीं वास्तविक दुनिया में व्यक्ति को खुद ही जूझना पड़ता है.. मुश्किलों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए.. वैसे भी वो कांधे मिलते भी कहाँ है!! जिनमें सिर टिकाकर रो लिया जाए.. हम भी तो यही करते हैं, दुःखी लोगों से दूर भागते हैं, खुशमिज़ाज लोगों को ढूंढते रहते हैं.  वैसे खुशियाँ तो सभी बांट लेते हैं, बहुत कठिन है किसी को मुश्किल वक़्त में सहारा देना…

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