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यादें : निर्देशकों के लिए सिलेबस हैं ऋषिकेश दा…

दिलीप कुमार स्तंभकार सत्यजीत रे को सिनेमा का पूरा संस्थान कहते हैं, तो विमल रॉय को सिनेमा का अध्यापक कहते हैं. वही ऋषिकेश दा को उस विद्यालय का स्टूडेंट कह सकते हैं. सत्यजीत, विमल रॉय, ऋषिकेश दा आदि का सिनेमा की यात्रा अपने आप में मुक्कमल सिलेबस है. फिल्म निर्देशन की दुनिया में गहराई, अध्यापन,…

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प्रेम त्रिकोण का नया ‘अंदाज” नर्गिस, दिलीप और राज…

दिलीप कुमार स्तंभकार महबूब खान निर्देशित फिल्म “अंदाज़” 1949 में आई उस दौर की सबसे बड़ी फ़िल्मों में से एक  इसमें प्रेम त्रिकोण में दिलीप कुमार, नर्गिस और राज कपूर हैं. दूरदर्शी संगीतकार नौशाद का संगीत है. गीत मजरुह सुल्तानपुरी द्वारा लिखें गए. अपने जारी होने के समय, अंदाज़ सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय…

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ब्लॉकबस्टर “आराधना” फिल्म शक्ति सामंत  बनाना ही नहीं चाहते थे…

दिलीप कुमार स्तंभकार आराधना एक ऐसी फिल्म थी, जिसमें राजेश खन्ना को सुपरस्टार बनाया, यह एक ऐसी फिल्म थी, जिसने शर्मिला टैगोर को एकलौता फिल्म फेयर पुरूस्कार दिलाया, आराधना एक ऐसी फिल्म थी, जिसने किशोर दा को बॉलीवुड में फिर से स्थापित कर दिया. जिसने शक्ति सामंत को उबारा ही नहीं बेस्ट फीचर फिल्म का…

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21वीं सदी : कहानी- किरदारों से सराबोर फिल्में

अगर हम 20वीं सदी के आखिरी तीन दशकों पर नजर डालें तो हिन्दी सिनेमा में फार्मूला फिल्मों और नायकों के स्टारडम का दबदबा रहा। इस दौर में फ़िल्मकार बड़े स्टार को साइने करके रोमांस, कॉमेडी, एक्शन, कुछ भावनात्मक दृश्य और गाने डालकर एक फिल्म तैयार कर लेते थे जो हिन्दी सिनेमा का आजमाया हिट फार्मूला…

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बॉलीवुड : बहुत दागदार है दामन

राखी बख्शी हिन्दी फिल्मों में नायक- नायिकाओं को सामाजिक मूल्यों पर आधारित आदर्श जीवन जीने वाले व्यक्तियों के रूप में दिखाया जाता है पर प्रसिद्धि, लोकप्रियता, धन और वैभव के मद में चूर कई फिल्म स्टार्स अपने निजी जीवन में बहुत कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसकी वजह से उन्हें न सिर्फ कटु आलोचना का…

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21वीं सदी के 21वें साल में हिन्दी सिनेमा

कहानी और उसके पात्र ही फिल्म की आत्मा होती है। फिल्में समाज को चेहरा दिखाती है। साथ ही उस दौर को परिभाषित भी करती है। 21 सदी के पिछले दो दशकों में कहानी और पात्रों की सीमा का तेजी से विस्तार हुआ है। कथा, पटकथा, पात्र और संवाद लेखन सभी स्तर पर नए प्रयोग हुए।…

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