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‘हिन्दी सिनेमा में होली के रंग’

लेखक : दिलीप कुमार हिन्दी सिनेमा ने हमेशा बताया है होली प्रेम का त्यौहार है. छोटे – बड़े में भेद मिटा देने, आपसी भाइचारे, सामाजिक सौहार्द वातावरण में मतभेद मिटा आपस में प्रेम से रहने का संदेश देता है. होली के दिन दिल खिल जाते हैं रंगों से रंग मिल जाते हैं.. आनन्द बक्शी ने…

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सिनेप्रेमी युवाओं का ढंग हमेशा ही विपरीत रहा है

लेखक : दिलीप कुमार आजकल एनिमल फ़िल्म चर्चा का विषय बनी हुई है. बनना भी चाहिए, क्योंकि हिन्दी सिनेमा की दूसरी सबसे कामयाब फ़िल्म बन गई है. मैं रणबीर का बहुत बड़ा प्रसंशक हूं, फिर भी एनिमल फ़िल्म मैं झेल नहीं पाया, और फ़िल्म आधी छोड़कर ही चला आया. मुझे तो विचित्र नहीं लगा, और भारी मन से इस बात को स्वीकार करता हूँ, क्योंकि मैं फ़िल्म देखने से पहले कहानी, निर्देशक, ऐक्टर सबकुछ समझने के बाद अपने तीन घण्टे खर्च करता हूँ…. मैं जानता हूं एक फिल्म बनने में कई परिवारों के लोगों की मेहनत शामिल होती है, इसलिए फिल्म न देखने का आव्हान मैं कभी नहीं कर पाता, अतः लिख देता हूं फिल्म मुझे पसंद नहीं आई, हालांकि मेरी पसंद सार्वभौमिक सत्य नहीं है, हो सकता है आपको पसंद आए. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, हर कोई अपने विचार रख सकता है. हमारे विचार ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंचते, लेकिन जावेद अख्तर साहब जैसे नामचीन हस्तियों का बोलना मतलब पूरे समाज़ में उनका भाषण असर करता है. जावेद अख्तर साहब ने कहा – “एनिमल फिल्म में नायक – नायिका को मारता है, और कहता है मेरे जूते चाटो’ ग़र ऐसी फ़िल्में ब्लॉकबस्टर हो रहीं हैं तो यह समाज के लिए बहुत ख़तरनाक बात है”. यह सुनकर एनिमल फिल्म के रायटर संदीप रेड्डी वांगा ने जावेद अख्तर साहब की रायटिंग स्किल पर ही सवाल उठा दिया, जो न काबिले बरदाश्त है. आप अपनी बात रख सकते थे, कोई प्रश्न कर सकते थे, जावेद अख्तर साहब सम्मानित इंसान हैं, वो खुद बड़ी विनम्रता पूर्वक जवाब देते, मुझे संदीप का जवाब अभद्र लगा हमें अपने से बड़ों के प्रति ऐसे कटुता के शब्द नहीं बोलने चाहिए. मैं जावेद अख्तर साहब से पूर्णतः सहमत हूँ, ऐसी फ़िल्में समाज के लिए हानिकारक हैं, लेकिन मेरा एक छोटा सवाल यह भी है ‘जैसा कि मैंने पहले बोला कि मेरी पसंद सार्वभौमिक सत्य नहीं है, और न ही जावेद अख्तर साहब की फ़िर भी वो कौन से लोग हैं जिन्होंने एनिमल फिल्म को’ ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर’ बना दिया? सवाल तो करना पड़ेगा. मैं जवाब देना चाहता हूं, वो इसलिए कि’ सिनेप्रेमी युवाओं का ढंग हमेशा ही विपरीत रहा है’. जी हां यह बात मैं बड़ी जिम्मेदारी से कह रहा हूं. जब हिन्दी सिनेमा में अमर प्रेम, आराधना, गोलमाल, चुपके – चुपके जैसी शुद्ध पारिवारिक फ़िल्में बन रहीं थीं, दूसरी ओर पार, बाज़ार, चश्मे बद्दूर, अर्धसत्य, सद्गति,…

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देव- दिलीप और राज की त्रिमूर्ति ने बनाया बालीवुड का रास्ता

लेखक : दिलीप कुमार ग्रेट शोमैन राज कपूर साहब करिश्माई फ़िल्मकार, अदाकार थे. राज कपूर साहब सिनेमैटोग्राफी में जादूगर थे. सिनेमाई समझ ऐसी की सीन शूट करते हुए कैमरा पर्सन राजसाहब से पूछता कि साहब कैमरे का एंगल ठीक है. मासूमियत भरी अदायगी यथार्थ भाव के बादशाह राज कपूर साहब का न भोलापन जब पर्दे…

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