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‘ मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया” पढ़ते हुए

समीक्षक आदित्य दत्ता 50 के दशक को भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग माना जाता है। 1950 के दशक के अंत तक भारतीय सिनेमा का स्टूडियो युग समाप्त हो गया और अभिनेताओं को उनके बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के आधार पर प्रति फिल्म भुगतान किया जाने लगा। अब अभिनेताओं को फिल्म निर्माण और प्रचार में एक प्रमुख…

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देव- दिलीप और राज की त्रिमूर्ति ने बनाया बालीवुड का रास्ता

लेखक : दिलीप कुमार ग्रेट शोमैन राज कपूर साहब करिश्माई फ़िल्मकार, अदाकार थे. राज कपूर साहब सिनेमैटोग्राफी में जादूगर थे. सिनेमाई समझ ऐसी की सीन शूट करते हुए कैमरा पर्सन राजसाहब से पूछता कि साहब कैमरे का एंगल ठीक है. मासूमियत भरी अदायगी यथार्थ भाव के बादशाह राज कपूर साहब का न भोलापन जब पर्दे…

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देवानंद- सुरैया : प्रेम जो अधूरा होकर भी मुकम्मल हो गया

लेखक : दिलीप कुमार इस निरंकुश दुनिया में अगर रोमियो – जूलिएट, हीर – रांझा थे, तो हमारे प्रिय देव साहब एवं सुरैय्या जी भी थे. वैसे भी इस निरंकुश दुनिया में प्रेम करना सबसे ज्यादा ख़तरनाक रहा ख़ासकर भारतीय परिवेश में जहां इंसानो से ज्यादा ग़ुरूर को तरजीह दी जाती हो. देव साहब एवं…

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‘सीआईडी’ ने तैयार की थी सस्पेंस थ्रिलर सिनेमा की जमीन  

लेखक- दिलीप कुमार गोल्डन एरा का एक – एक गीत एक – एक फ़िल्म कई कहानियों को समेटे हुए है. सिनेमा के इस दौर को स्वर्णिम काल कहां जाता है. इस सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म से हिन्दी सिनेमा में तीन – तीन धूमकेतुओ का उदय हुआ था.  एक तो मिस्ट्री मेकर राज खोसला, वहीदा रहमान, एवं…

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जीनत अमान की दास्तान … अभी न जाओ छोड़ के…!

दिलीप कुमार लेखक देव साहब के अपने दौर में या उनके दशकों बाद या आज के दौर में “अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं” ऐसे गुनगुनाती फीमेल फैन्स दिखती हैं तो यूँ लगता है, कि वो अपने हीरो देवानंद साहब को प्रेम प्रस्ताव भेज रही हैं. तीन पीढ़ियों में संवेदनशील प्रेमी के…

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कालापानी की काहनी : नजर लागी राजा…  देवानन्द ने राज खोसला को कर दिया अमर!

दिलीप कुमार स्तंभकार देव साहब, मधुबाला, एवं नलिनी जयवंत अभिनीत,  राज खोसला के निर्देशन में देव साहब के नव केतन बैनर तले बनी फिल्म ‘काला पानी’ एक ऐसे व्यक्ति कि कहानी है, जो अपने निर्दोष पिता के उम्रकैद की सजा को गलत सिद्ध करना चाहता है। राज खोसला देव साहब की खोज थे। इनको पहला…

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नूतन और देवानन्द यानि फिल्म काला की दो धाराओं का मिलन

दिलीप कुमार देखो रूठा न करो दिलीप कुमार लेखक    “तेरे घर के सामने” एक कॉमेडी, रोमांटिक फिल्म है.जो सामाजिक संदेश भी दे जाती है कि “जो कुछ नया है वह बुरा नहीं है, न ही वह सब कुछ पुराना अच्छा है”कहानी एक युवा आर्किटेक्चर राकेश (देवानंद) की है, जो पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के…

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