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कविता : नि:शब्द

प्रियरंजन पाढ़ी की दो कवितायें निशब्द हैं सब, उपवन, समीर, विहग जब, तुम क्या करते हो तब? नहीं सोचते उनको क्या? पीड़ा विगत दिनों की, उभर आती मस्तक पर बन स्वेद कण, मस्तिष्क में दबी स्मृतियां, रहती हैं ज्यों की त्यों, तुम नहीं सोचते उनको क्या? जब होता है निशब्द अधूरी अनकही बातों को तलाशते,…

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व्यंग्य : राजा होगा भईया, बाकी जी हुजूर

मनीष शुक्‍ल मै राजा नहीं बनूंगा। मैने आपको बार- बार कहा है कि किसी और को राजा दो। पर आप सुनेते ही नहीं हो। घुमा फिराकर मुझे ही राजा बना देते हो फिर कहते हो चोर का पता लगाओ। चिंटू आज आज अपनी दीदी पर कुछ ज्‍यादा ही गुस्‍सा था। जब भी अपने दोस्‍तों के…

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कहानी : “देहदान”

डॉ. रंजना जायसवाल बचपन  में  जब खुद को ढूंढना होता तो आस्था बारिश में भीग लेती। पानी की बूंदे सिर्फ तन को ही नहीं मन को भी अंदर तक धुल देती और वो अपने अंदर एक नई आस्था को पाती। आस्था…आस्था यही नाम तो रखा था बाबा ने उसका…क्योंकि उन्हें विश्वास था कि कुछ भी…

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कविता : प्रेम…

डॉ जया आनंद प्रेम पाना आसान है इसके लिए अहं को कूटना पीसना है बस थोड़ा सा सरल होना है ….और सरल होना शायद! कितना कठिन !!! …पर मेरे लिए नहीं, कबीर को थोड़ा तो समझा ————————— 2. प्रेम आत्मा को उज्ज्वल करता हुआ विस्तार देता है संकुचन नहीं, विचारों को परिष्कृत करता हुआ उदार…

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मसला कोई भी हो जिम्मेदार मोदी और नेहरू

व्यंग्य मनीष शुक्ल आजादी के बाद से लेकर अब तक 70 से ज्यादा सालों में देश ने लंबी दूरी तय की है। एक से बढ़कर एक नेता देखे हैं। अनेक प्रधानमंत्री देखे हैं। 1947 से लेकर 2021 तक की विकास यात्रा देखी है। लेकिन देश में आजकल जो भी हो रहा है उसके लिए देश…

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अबकी आना तो …

सीमा सिंह कि दो कवितायें … घाट की सीढ़ियों पे छोड़ आये थे  जो अधूरा दिन  चलो न उसे पूरा करते हैं  !  सुनो  ! अबकी आना  तो इतवार की दोपहरी का  इत्तमनान भी लेकर आना   ,  ढूँढनी है मुझे इस बार  चुप्पियों में छिपी संभावनाएँ  ,  मौन के उस पार जो एक तुम…

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बड़े मैचों में हार, विज्ञापन की सरताज टीम इंडिया

मनीष शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार कागजों में दुनियाँ की सबसे मजबूत हमारी क्रिकेट टीम एक बार फिर बड़े मैच में फेल हो गई है। स्टार खिलाड़ियों से सजी धजी टीम फाइनल मैच में तास के पत्तों की तरह बिखर गई है। यह पहली बार नहीं हुआ है जब खिताब के इतने करीब पहुँचकर टीम को हार…

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