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आजादी के 75 साल : नई लड़ाई में भटकें नहीं

समीर सूरी कहा जाता है कि एक बार सभी बुद्धिजीवी एक साथ स्वर्ग पहुँचे पर वहाँ जगह खाली नहीं थी। दुर्भाग्य से  वहाँ केवल एक के लिए ही जगह उपलब्ध थी। उस एक जगह के नीतिगत आवंटन के लिए भगवान ने अच्छे और बुरे कर्मों का खाता खोल कर बाँचा । अरे ये क्या? इसमे…

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कविता : नैतिकता

कवि- जी. पी.वर्मा नबाबों के शहर- लखनऊ में- एक लड़की ने- कैब ड्राइवर पर हाँथ- क्या उठाया- गूँगी नैतिकता – चीख उठी! कार्यवाही की-  कांव कांव हुई! ट्वीट मिमियाने लगे!! पर नैतिकता तब- निरीह -मौन- शरमाई रहती जब मर्द- किसी औरत को – सड़को पर- दौड़ा दौड़ा डंडों से- पीटता, वो गिड़गिड़ाती मदद मांगती!! शायद,पिटना…

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आजादी के प्लेटिनम जुबली साल में आम आदमी

मनीष शुक्ल दोस्तों, आजादी के इस समारोह के साथ ही हमने स्वतंत्रता के प्लेटिनम जुबली वर्ष में कदम रख दिया है। आजादी के इतने सालों में हम बैलगाड़ी से राफेल युग में फूंच चुके हैं। देश ने खूब तरक्की की। कई उतार चढ़ाव देखे हैं। लेकिन इस तरक्की और उतार चढ़ाव के बीच आम आदमी…

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कहानी : जेहादी नहीं डाक्टर बनेगा बेटा…

लेखक : मनीष शुक्ल “साब! आप लोग घूमो, फिरो, यहाँ के नजारे लो, बरफ देखो, शिकारे पर जाओ कहवा पियो और हसीन यादें लेकर हिंदुस्तान लौट जाओ।“ यह सुनते ही शर्मा जी चौंक पड़े। वो टूरिस्ट गाइड था और कई दिनों से वो मिस्टर शर्मा को कश्मीर घूमा रहा था, अब उनके साथ घुल मिल…

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व्यंग्य : एडमिनासुरों से मुक्ति

संजीव जायसवाल ‘संजय’ बचपन से उनकी ख्वाहिश अपना साम्राज्य स्थापित करने की थी. मगर नोन-तेल-लकड़ी के चक्कर में ऐसा उलझे कि पैरों की जूतियां तक घिस गईं. हाकिमों की जी-हुजूरी और चाकरी करते-करते ज़मीर मुर्दा हो गया. सारी ख्वाहिशें, सारी तमन्नाएं कहीं गहरे में दफन हो गई थी. बेज़ार जिंदगी के हाल देख वे ज़ार…

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कविता : प्रेम का नाजुक ख्याल

कवि : जी पी वर्मा प्रेम का नाज़ुक-ख़याल!बेबाकी से-सप्त स्वरों की-झंकार सा –नीलाम्बर मे-झिलमिल-तारा किरणों की-अटूट पाँति सा लहराए!धरा से नभ-नभ से ब्रह्मांड तक-हर तरफ गहराए!!मेरे, तुम्हारे –हम सबके लिए –जीवन वंशी-नफरत नहीं-प्रेम गीत गाए-इंद्रधनुषी छटा बिखराये-तो कितना अच्छा हो!!!

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लघु कहानी : जोशी जी के दर्द पर मरहम

लेखक : मनीष शुक्ल अचानक आँखों से आंसुओं की धारा बहने लगती है। इतनी भी हिम्मत नहीं होती है कि अपना हाथ बढ़ाकर उन आंसुओं को पोंछ सकें। बस, असहनीय दर्द और अकेलेपन का अहसास यही जेहन में घूमता रहता है। शब्द खुद ब खुद बढ़बढ़ाने लगते हैं… शायद अब मेरा समय आ गया है।…

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व्यंग्य : मीडिया स‌र्कस का ‘रंगा सियार’

रवींद्र रंजन मीडिया स‌र्कस का ‘सियार’ बहुत फैशनेबल है। रंगा सियार है। बूढ़ा हो चुका है। जवान दिखने की हसरत है। यह हसरत हर वक्त उसके दिल में हिलोरें मारती रहती है। कई बार तो छलक कर बाहर तक आ जाती है। पूरे रिंग पर बिखर जाती है। हसरतें उससे बहुत कुछ कराती हैं। रंगा…

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भारतीय मूल के उपन्यासकार संजीव सहोता की किताब ‘चाइना रूम’ बुकर की दौड़ में

भारतीय मूल के ब्रितानी उपन्यासकार संजीव सहोता उन 13 लेखकों में शामिल है, जिनकी किताब ‘चाइना रूम’ को इस साल बुकर पुरस्कार के दावेदारों की सूची में शामिल किया गया है। 40 वर्षीय सहोता के दादा-दादी 1960 के दशक में पंजाब से यहां आ गए थे। सहोता ने पहले भी ‘द ईयर ऑफ द रनवेज’…

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