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कहानी : मंदी से तरक्की की राह

लेखक : मनीष शुक्ल मंदी की तलवार अचानक ऐसे चल जाएगी ये तो कभी सोचा भी नहीं था… रौनिक उपाध्याय सुबह तैयार होकर ऑफिस गया और शाम को टर्मिनेशन लेटर लेकर घर लौट आया। रौनिक घर आकर सीधे बेड रूम में जाकर पसर गया। न सुनिधि से कुछ बोला, न ही यशी को गोद में…

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जन्मदिन : साहित्य में सूर्य बनकर चमके राष्ट्रकवि दिनकर

छायावाद की छाया से निकलकर राष्ट्रवाद की अलख जगाने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म आज के दिन यानि 23 सितंबर 1908 को हुआ था। मूलरूप से छायावादी कवि ने राष्ट्रवाद की एक से बढ़कर एक कविताएं लिखी। जब आजादी का संघर्ष चरम पर था उसी समय दिनकर की कविताएं देश में जोश भर…

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व्यंग्य : करोना और भूकंप, मच गया हड़कंप

लेखक : मनीष शुक्ल अरे यार! खाली ही चाय ले आई हो… चिप्स या पापड़ ही भून लेती तो कसम से मजा आ जाता… जैसे ही अभिषेक ने अपनी फरमाइश ‘इन्दु’ को सुनाई तो तुरंत झल्लाकर बोली- बारात में नहीं आए हो तुम लोग, जो दिनभर ऑर्डर मारा करते हो। कभी पानी ले आओ, कभी…

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व्यंग्य : इल्जाम क्रिकेट पर

लव कुमार सिंह देवियों और सज्जनों! हमारे 50 साला पड़ोसी के घुटने बोल गए हैं। वे अपने दिल से भी लाचार हो गए हैं। पता है इल्जाम किस पर आया है? पहले महेंद्रि सिंह धोनी, अब विराट एंड कंपनी का नाम आया है। आपको भले ही इस पर हंसी आए, पर पड़ोसी इस इल्जाम पर…

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व्यंग्य : डोन्ट बरी ! फूड और प्वाइजन दोनों हो जायेंगे सस्ते ….!

डोन्ट बरी ! फूड और पोआईजन दोनों हो जायेंगे सस्ते ….! रवीन्द्र प्रभात कल दफ्तर से लौटा, निगाहें दौड़ाई, हमारा तोताराम केवल एक ही रट लगा रहा था- “राम-नाम की लूट है लूट सकै सो लूट………!” कुछ भी समझ में न आया तो मैंने तोते को अपने पास बुलाया और फरमाया- मुंह लटकाता है, पंख…

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आजादी के 75 साल : नई लड़ाई में भटकें नहीं

समीर सूरी कहा जाता है कि एक बार सभी बुद्धिजीवी एक साथ स्वर्ग पहुँचे पर वहाँ जगह खाली नहीं थी। दुर्भाग्य से  वहाँ केवल एक के लिए ही जगह उपलब्ध थी। उस एक जगह के नीतिगत आवंटन के लिए भगवान ने अच्छे और बुरे कर्मों का खाता खोल कर बाँचा । अरे ये क्या? इसमे…

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कविता : नैतिकता

कवि- जी. पी.वर्मा नबाबों के शहर- लखनऊ में- एक लड़की ने- कैब ड्राइवर पर हाँथ- क्या उठाया- गूँगी नैतिकता – चीख उठी! कार्यवाही की-  कांव कांव हुई! ट्वीट मिमियाने लगे!! पर नैतिकता तब- निरीह -मौन- शरमाई रहती जब मर्द- किसी औरत को – सड़को पर- दौड़ा दौड़ा डंडों से- पीटता, वो गिड़गिड़ाती मदद मांगती!! शायद,पिटना…

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आजादी के प्लेटिनम जुबली साल में आम आदमी

मनीष शुक्ल दोस्तों, आजादी के इस समारोह के साथ ही हमने स्वतंत्रता के प्लेटिनम जुबली वर्ष में कदम रख दिया है। आजादी के इतने सालों में हम बैलगाड़ी से राफेल युग में फूंच चुके हैं। देश ने खूब तरक्की की। कई उतार चढ़ाव देखे हैं। लेकिन इस तरक्की और उतार चढ़ाव के बीच आम आदमी…

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कहानी : जेहादी नहीं डाक्टर बनेगा बेटा…

लेखक : मनीष शुक्ल “साब! आप लोग घूमो, फिरो, यहाँ के नजारे लो, बरफ देखो, शिकारे पर जाओ कहवा पियो और हसीन यादें लेकर हिंदुस्तान लौट जाओ।“ यह सुनते ही शर्मा जी चौंक पड़े। वो टूरिस्ट गाइड था और कई दिनों से वो मिस्टर शर्मा को कश्मीर घूमा रहा था, अब उनके साथ घुल मिल…

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व्यंग्य : एडमिनासुरों से मुक्ति

संजीव जायसवाल ‘संजय’ बचपन से उनकी ख्वाहिश अपना साम्राज्य स्थापित करने की थी. मगर नोन-तेल-लकड़ी के चक्कर में ऐसा उलझे कि पैरों की जूतियां तक घिस गईं. हाकिमों की जी-हुजूरी और चाकरी करते-करते ज़मीर मुर्दा हो गया. सारी ख्वाहिशें, सारी तमन्नाएं कहीं गहरे में दफन हो गई थी. बेज़ार जिंदगी के हाल देख वे ज़ार…

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