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संस्मरण : भारत-भूटान साहित्यिक यात्रा… “आवागमन व्यवस्था और भ्रमण “

लेखिका : डॉ. अरुणा पाण्डे

सेवा निवृत्त प्राध्यापक

यात्रा के संयोजक पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी शिलांग से डॉ. अकेला भाई के द्वारा पहले ही दिन से  निर्देशित कर दिया गया था कि 5/6/24 को किस किस समय बागडोगरा / न्यू जलपाईगुड़ी से भूटान के लिए प्रस्थान करना है |सभी ने उसी के अनुसार अपने पहुंचने के टिकट कराये थे | 4/6/24 को हमारा What’s app ग्रुप बहुत व्यस्त था | कौन पहुँच गया, कहाँ रुका है, कहाँ घूमने चले गए हैं, कौन अपने शहर से चल दिया है, किसकी ट्रेन लेट हो गई, किसकी निरस्त हो गयी, किसकी ट्रेन छूट गयी, किसकी flight cancell हो गयी, साथ में सबके photos ग्रुप में, अकेले, ट्रेन में, वेटिंग रूम में, प्लेटफॉर्म में, प्लेन में airport में, होटल में, tourist spots पर बहुत कुछ | 5/6/24 को पुन: बागडोगरा से 12 बजे और न्यू जलपाईगुड़ी से 1 बजे निकलने के निर्देश थे | बस कितने बजे तक लग जायेगी, बस drivers के फोन नम्बर, बागडोगरा से चलने वालों की सूची, न्यू जलपाईगुड़ी से रवाना होने वालों की सूची, फ़ुएन्तशोलिंग में होटल और रूम नंबर के अनुसार सूची  सभी कुछ मोबाइल फोन पर उपलब्ध था | दस- दस, बारह- बारह लोगों के समूह पहले ही बना दिये गए थे | हर समूह का एक एक मुखिया था जिसे अपने समूह वालों की जानकारी रखना थी |  हमारे ग्रुप के admin थे नांदेड़ से डॉ. जहीरुद्दीन  पठान |सभी को अपने साथ अपने photos, passport/ voter I. D. रखने के निर्देश भी मिल चुके थे | दोहराए भी जा रहे थे | group admin भी कहते जा रहे थे कि उपरोक्त चीजें बस में ऊपर रखे बैग में न रखें जिससे border पर परेशानी न हो |  कुछ लोग ट्रेन लेट  होने या अन्य वजह से समय पर नहीं पहुँच पा रहे थे | हम सब रवाना हो  ही रहे थे कि डॉ. अकेला भाई का मैसेज आया कि आज का कार्यक्रम चाहे लेट शुरू हो परंतु सभी को साथ लेकर चलना है | हमारे कुछ साथी जो रायपुर छत्तीसगढ़ से आने वाले थे वे ट्रेन में हैं पहुंचने में लेट हो जायेंगे |  शायद कलकत्ता से भी कुछ की flight लेट थी |अच्छा लगा ऐसे निर्णय लोगों को आयोजनकर्ता के प्रति आश्वस्त करते हैं | तभी रवि श्रीवास्तव जी ने सलाह दी कि केवल एक गाड़ी रुक जाए बाकी बस, travellers वगैरह निकल जायें | इसको माना गया | इस तरह से 5 जून की दोपहर पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी शिलांग के द्वारा आयोजित भारत- भूटान साहित्यिक यात्रा प्रारंभ हो चुकी थी |  हम भूटान के लिए चल दिये थे| हमारी बस के कुछ लोगोँ ने भोजन नहीं किया था, कारण भोजन विवरण के समय बतालाऊँगी, अभी आवागमन पर ध्यान देती हूँ | तो रास्ते में हम रुके एक शाकाहारी रेस्टोरेंट में | यहाँ हम लगभग डेढ़ घंटे लेट हो गए | आगे बढ़े तो पहाड़, हरियाली, चाय के बागान सब कुछ मनमोहक | रास्ते में कई कस्बे, गाँव पड़े पर दृश्यों से नज़र हटाकर उनका नाम डायरी में लिखने का मन ही नहीं हुआ | एक नाम जरूर याद है फालाकाटा | इसे हमने इस तरह याद रखा कि फल तो काट कर खाते हैं तो फल काटा और प्रत्येक अक्षर में आ की मात्रा लगा देना है हो गया फालाकाटा | driver तीश्ता नदी के बारे में बतला रहे थे सुना पर लिखा नहीं | कुछ स्थानों पर एक से घरों की बहुत सी कतारें दिखाई दीं | driver से पूछा तो पता चला कि ये सब ममता दीदी ने बागान में काम करने वाले मजदूरों के लिए बनवाये हैं | याद आ गया कल  देर शाम को न्यूजलपाई गुड़ी में निकला विजय जुलूस |

भारत का अंतिम शहर था  जयगाँव | याद रखने के लिए याद किया महाराष्ट्र का जलगाँव, ल के स्थान पर य | border के पास पहुंचे | अब हमें कुछ दूर shorcut गलियों से गाइड के साथ जाना था | बस सामान लेकर दूसरे रास्ते से जायेगी | करीब पांच बज गए थे | हम सब बस से उतरकर हाथ पैर सीधे कर रहे थे कुछ ग्रुप फोटो लिए गए | हमें लगा देर हो रही है गाइड नहीं आ रहा | कुछ समझने में गड़बड़ी हुई थी, गाइड का फोन नहीं लग रहा था | खैर एक गाइड आ चुके थे वॉन्गोपो  निक नेम ऑप्पो  | एक लड़की भी साथ थी वह टूर मैनेजर थी | अभी हमें कुछ देर और रुकना था | एक और बस आ रही थी | दोनों के यात्रियों को एक साथ जाना था | हमारी बस के driver भाई देर होने के कारण नाराज से बार बार पूछ रहे थे कितनी देर और लगेगी? स्वभाविक बात थी बिना किसी की गलती के उन्हें देर हो रही थी |

दूसरी बस के आने पर हमारे गाइड ने भी हमें निर्देश दिए और अपने पीछे आने को कहा – follow me बहुत हंसमुख गाइड ऑप्पो | हम चल दिये पीछे पीछे | अपनी अपनी ID दिखलाकर अंदर दाखिल हुए | एकदम साफ सुथरा बरामदा रास्ता, दीवालों पर बड़ी बड़ी भूटानी पेंटिंग्स | सैल्फी और फोटो लेने वालों को तो बड़ा आनंद आ रहा था | लगभग सभी के मोबाइल के कैमरे चालू थे | फॉर्मेलिटीज के बाद हम बाहर निकले | बड़ा साफ परिसर |  सभी बसें वहाँ थीं सभी लोग अपना अपना सामान लेकर hotels की ओर जा रहे थे | हमारी बस नहीं थी | कुछ देर इंतज़ार करने के बाद driver को फोन लगाया गया पता चला देर  होने के कारण सबका सामान hotel Gadhen में रख बस वापस चली गयी है | हम hotel Gadhen पहुंचे रास्ते में ही हमारा होटल evergreen9 था | Hotel Gadhen में हमारा सामान होटल की स्लिप लगा हुआ बहुत व्यवस्थित रखा था | driver भाई के लिए दुआएं निकली |  कोई भी इतना ज्यादा समय कैसे दे सकता है | अच्छा यह था कि देर हो जाने के बाद भी driver भाई ने सबका सामान ठीक से रखा | अपना  सामान ले होटल पहुंचे | Reception पर मुस्कराते चेहरे | रूम की चाबी हमें मिल गयी | एक हंसमुख लड़के ने कमरे तक सामान पहुंचाया |

दूसरे दिन याने 6 को सुबह नाश्ता कर हम होटल से बाहर आकर हम pedestrain terminal के बाहर आ चुके थे | सामान बसों में driver और गाइड ने व्यवस्थित रख लिया था | आज से हमारे साथ भूटान के driver थे गाइड वही ऑप्पो |थिम्फू जाने के लिए सबके permission letter गाइड और टूर मैनेजर दे रहे थे | कुछ लोगों ने पूर्व में दी गयी सूचना  के अनुसार मूल प्रति की फोटो न भेजकर black and white photocopy की फोटो भेजी थी | इन लोगों का letter मिलने में समय लग गया | खैर अबकी बार हम 18- 18 लोग ट्रैवेलर में थे साथ में एक एक गाइड | प्रत्येक में पानी की bottels, बिस्किट नमकीन के पैकेट | प्रत्येक बस में बड़े बड़े स्टिकर में भारत-भूटान साहित्यिक यात्रा बस क्रमांक था | बस क्रमांक 1 से 7 तक था | अब 9 तारीख तक यही बसें हमारे साथ थीं | निर्देश थे कि जो जिस बस में है वह प्रतिदिन उसी बस में रहेगा | वही पहाड़ियों का  हरा भरा सौंदर्य, साफ बिना गड्ढे वाली सड़कें, गाइड द्वारा मिलती जा रही जानकारियां  सब कुछ सुंदर, सुखद, आरामदायक | बीच में entry पर चेकिंग के लिए किसी को बस से नहीं उतरना पड़ा | गाइड ऑप्पो ने सबके permission letter / passport ले लिए थे | जब ऑप्पो सब चैक करा रहे थे हम वहाँ लगे सुंदर फूलों के देख रहे थे |  सारा रास्ता बहुत सुंदर | सभी ओर प्रकृति  की खिलखिलाहट,  पौधों पेड़ों की एक एक पत्ती साफ धुली हुई | पहाड़ों से नीचे आता पानी किनारे किनारे बहता हुआ |  बीच में भोजन के लिए  एक रेस्टोरेंट में रुके  | सब  फिर से photos में सौंदर्य कैद करने में जुट गए | तभी तेज बारिश आ गयी | हम सब बस में आ गए थे | lunch packets बस में आ गए थे | तो  पानी गिरने के आनंद के साथ लंच किया | आगे की यात्रा  प्रारंभ हो गयी |एक स्थान रुके बहुत ऊँचे पहाड़ से बहता झरना| सब बच्चों के समान आल्हादित | सुंदर पोज में फोटो लिए गए | शाम चाय के लिए भी एक खूबसूरत जगह रूके |   रेस्टुरेंट ऊपर पहाड़ी था | वो दस पंद्रह सीढ़ियां चढ़ना सबको अच्छा लगा आखिरकार ऊपर से देखने पर अलग ही सौंदर्य दिखता है | दूर दिखती हरी भरी पहाड़ियाँ, रेस्टोरेंट के बाहर लगे सुंदर सुंदर पुष्प कैमरों को काम मिलना ही था |

ग्रुप में और अलग अलग पोज में तस्वीरें ली जा रही थीं | यहाँ से पारो 30 किलोमीटर था खैर अभी तो हमें थिम्फू जाना है |  रास्ते में जहाँ जहाँ रुके वहाँ से आगे बढ़ने का किसी का मन नहीं पर शाम साहित्यिक कार्यक्रम भी तो होना था |

थिम्फू में हमारी होटल थी Druk Noryang | आधे लोग होटल Nordenma में थे | शाम भोजन के बाद होटल Nordenma की छटवीं मंजिल में कार्यक्रम था |

7 जून सुबह नाश्ते के बाद  सब अपनी अपनी बसों में सवार | थिम्फू घूमने का प्रोग्राम था | सबसे पहले पहुंचे पहाड़ी पर बने बौद्ध मठ में | बुद्ध की विशाल मूर्ति जो शहर से सफेद सी दिख रही थी वह वास्तव में सुनहली थी | 

कुछ सीढ़ियों के बाद विशाल परकोटा | चारों ओर सुनहली सुंदर मूर्तियाँ उसके बाद पुन: कुछ सीढ़ियां एक परकोटा | जिसमें बाहर एक ओर बहुत सारा प्रसाद था | शायद कुछ दिन पुराना हो गया था | जिसे जो ले जाना है ले जाए या यहीं प्राप्त कर ले | फिर सीढ़ियां बुद्ध की विशाल मूर्ति के नीचे का परकोटा | बीच में एक बड़ा कक्ष जिसके प्रवेश द्वार के सामने फूलों की टोकरियाँ | एक ओर हल्के पीले रंग के पवित्र जल से भरी शीशियाँ जो चाहें ले जाएं | कक्ष के भीतर बायीं ओर से दीवालों से सटी book self की कतारें जिनमें सैकड़ों किताबें | लगा बुद्ध पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है | बहुत सारे बौद्ध भिक्षु कक्ष के बीच रखे गद्दे किनारे जमा रहे थे | सामने दीवाल पर बौद्ध संतों की मूर्तियाँ | एक भिक्षु से बात करने पर पता चला वे लोग किसी अन्य मठ से आये हुए हैं |  पांच दिवसीय आयोजन में शामिल होने आये हैं |आज वापस हो रहे हैं | इसी कक्ष में अध्ययन और विश्राम इसीलिए गद्दे थे | कुछ सीढ़ियां चढ़ने पर बुद्ध की विशाल मूर्ति | प्रत्येक परकोटे पर चारों ओर घूम घूम कर प्रकृतिऔर मठ की सुंदरता का आनंद लिया गया |

अगला पड़ाव था हिंदू मन्दिर | वही साफ सुथरा परि षर | मुख्य मन्दिर में प्रवेश करते ही सामने पुजारी जी थे | वहीं से भगवान का दर्शन कर प्रसाद ले वापस आया जा सकता था पर वहाँ सामने से line नहीं लग रही थी बल्कि मन्दिर में प्रवेश कर बायीं ओर बढ़ जाना था और परिक्रमा करते हुए दाहिनी ओर आना था | जहाँ भी लाइन का अंतिम व्यक्ति हो उसके पीछे चलते आना था | सामने तक पहुँच दानपात्र में श्रद्धा या इच्छानुसार दान दे, पुजारी जी से प्रसाद लेकर बाहर आना था | यह व्यवस्था भी भा गयी | मन्दिर के बाहर प्रवेश द्वार पर भीड़ नहीं दिखती परिक्रमा हो जाती है उसके साथ अंदर से पूरा मन्दिर देख लेते हैं प्रभु मूर्तियों के दर्शन हो जाते हैं आसानी से |

दूसरी बात बाहर शिव जी विराजमान थे उनके सामने नंदी महाराज | एक बड़े पात्र में जल रखा था, एक छोटा पात्र साथ था |सभी ने शिव जी को जल अर्पित किया |  सामने पहाड़ी सुंदर सुंदर |

तीसरी बात भी बड़ी अच्छी लगी | मन्दिर में बाहर बाहर एक दीवाल पर प्रत्येक ग्रह का एक कक्ष, कक्ष, में मूर्ति, मूर्ति के सामने उस ग्रह के रंग का आसन बिछा थे जैसे मंगल का लाल, शनि का काला और ग्रह के अनुसार पूजन सामग्री थी जैसे हरे मूंग की दाल काले उड़द की दाल, चने की दाल, काले तिल आदि बड़ा अच्छा लगा यह देखकर |भूटान में अधिकांश बौद्ध धर्मी लोग हैं| पुजारी जी से पूछा कि आप बाहर से आये हैं? उन्होंने बतलाया हम भूटान के हिंदू हैं | हमारा अगला पड़ाव भूटान का preserve-  Royal Takin Genetic Preserve था जहाँ भूटान के राष्ट्रीय पशु तकिन से मुलाकात हुई | तकिन के विषय में mythological story का पता चला पर वह आगे | शायद एक साथ इतना सारा पढ़ना पढ़ने वालों को बोर न कर दे |

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