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कारगिल विजय दिवस : पाक के धोखे की निशानी, 18 हजार फीट की ऊंचाई पर वीर सपूतों के शौर्य की  कहानी

भारत और पाकिस्तान यूँ तो सबसे करीबी पडोसी हैं… इस पडोसी से रिश्ते सुधारने ने के लिए फरवरी 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने भारत से लाहौर तक बस यात्रा की थी… लेकिन चंद महीनों के भतार ही पाकिस्तान ने एकबार फिर भारत पीठ में छुरा भोंका… जिसका नतीजा कारगिल युद्ध के रूप में सामने आया… जिसके बाद भारत के वीर सपूतों ने आज से 23 साल पहले 18 हजार फुट की उंचाई पर पाक घुसपैठियों को मुहतोड़ जवाब दिया… और 26 जुलाई को कारगिल पर दोबारा फतह हासिल की…

कारगिल युद्ध से पहले फरवरी में अटल और नवाज शरीफ ने लाहौर घोषणा पर हस्ताक्षर किए। जिसके तहत अन्य बातों के साथ-साथ यह सहमति हुई कि दोनों पक्ष परमाणु हथियारों के आकस्मिक या अनधिकृत उपयोग के जोखिम को कम करने के उपायों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध थे। हालांकि, यात्रा के कुछ महीने बाद, पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के करगिल में उनकी सेना भेजकर वाजपेयी की पूरी कोशिशों पर पानी फेर दिया था, जिसके बाद दोनों देशों के बीच नए संघर्ष की शुरुआत हो गई।

जिस इलाके में ये युद्ध लड़ा गया। वहां सर्दियों में -50 तक तापमान चला जाता है। सर्दियों के मौसम में इन इलाकों को खाली कर दिया जाता था। इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ की गई। इस घुसपैठ में पाकिस्तान की सेना ने भी मदद की। 3 मई 1999 को कुछ स्थानीय चरवाहों ने भारतीय सेना के लोगों को घुसपैठ के बारे में बताया। सूचना मिलने के बाद पांच मई 1999 को भारतीय सेना ने पेट्रोलिंग पार्टी को घुसपैठ वाले इलाके में भेजा। पेट्रोलिंग पार्टी जब घुसपैठ वाले इलाके में पहुंची तो घुसपैठियों ने पांचों जवानों को शहीद कर दिया। शहीद जवानों के शव से बर्बरता भी की गई। घुसपैठिए लेह-श्रीनगर हाईवे पर कब्जा कर लेना चाहते थे। इसके जरिए वह लेह को बाकी हिन्दुस्तान से काट देना चाहते थे। इसके बाद शुरू हुआ तनाव और संघर्ष 84 दिन चला। 84 दिन बाद 26 जुलाई 1999 को भारत को जीत मिली।  

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