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फिल्म फेयर : मिल गया तो मिट्टी, न मिला तो सोना…

लेखक : दिलीप कुमार हिन्दी सिनेमा में दादा साहब फाल्के पुरूस्कार के बाद फिल्मफेयर पुरूस्कार सबसे बड़ा माना जाता है. हालाँकि दादा साहेब फाल्के पुरूस्कार की पात्रता बहुत कठिन है, हिंदी सिनेमा में सक्रिय 50 साल का सफ़ल कॅरियर होना सबसे बड़ी पात्रता है. वहीँ फिल्मफेयर हर साल आयोजित होता है. जिसे मिल गया तो…

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सिनेप्रेमी युवाओं का ढंग हमेशा ही विपरीत रहा है

लेखक : दिलीप कुमार आजकल एनिमल फ़िल्म चर्चा का विषय बनी हुई है. बनना भी चाहिए, क्योंकि हिन्दी सिनेमा की दूसरी सबसे कामयाब फ़िल्म बन गई है. मैं रणबीर का बहुत बड़ा प्रसंशक हूं, फिर भी एनिमल फ़िल्म मैं झेल नहीं पाया, और फ़िल्म आधी छोड़कर ही चला आया. मुझे तो विचित्र नहीं लगा, और भारी मन से इस बात को स्वीकार करता हूँ, क्योंकि मैं फ़िल्म देखने से पहले कहानी, निर्देशक, ऐक्टर सबकुछ समझने के बाद अपने तीन घण्टे खर्च करता हूँ…. मैं जानता हूं एक फिल्म बनने में कई परिवारों के लोगों की मेहनत शामिल होती है, इसलिए फिल्म न देखने का आव्हान मैं कभी नहीं कर पाता, अतः लिख देता हूं फिल्म मुझे पसंद नहीं आई, हालांकि मेरी पसंद सार्वभौमिक सत्य नहीं है, हो सकता है आपको पसंद आए. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, हर कोई अपने विचार रख सकता है. हमारे विचार ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंचते, लेकिन जावेद अख्तर साहब जैसे नामचीन हस्तियों का बोलना मतलब पूरे समाज़ में उनका भाषण असर करता है. जावेद अख्तर साहब ने कहा – “एनिमल फिल्म में नायक – नायिका को मारता है, और कहता है मेरे जूते चाटो’ ग़र ऐसी फ़िल्में ब्लॉकबस्टर हो रहीं हैं तो यह समाज के लिए बहुत ख़तरनाक बात है”. यह सुनकर एनिमल फिल्म के रायटर संदीप रेड्डी वांगा ने जावेद अख्तर साहब की रायटिंग स्किल पर ही सवाल उठा दिया, जो न काबिले बरदाश्त है. आप अपनी बात रख सकते थे, कोई प्रश्न कर सकते थे, जावेद अख्तर साहब सम्मानित इंसान हैं, वो खुद बड़ी विनम्रता पूर्वक जवाब देते, मुझे संदीप का जवाब अभद्र लगा हमें अपने से बड़ों के प्रति ऐसे कटुता के शब्द नहीं बोलने चाहिए. मैं जावेद अख्तर साहब से पूर्णतः सहमत हूँ, ऐसी फ़िल्में समाज के लिए हानिकारक हैं, लेकिन मेरा एक छोटा सवाल यह भी है ‘जैसा कि मैंने पहले बोला कि मेरी पसंद सार्वभौमिक सत्य नहीं है, और न ही जावेद अख्तर साहब की फ़िर भी वो कौन से लोग हैं जिन्होंने एनिमल फिल्म को’ ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर’ बना दिया? सवाल तो करना पड़ेगा. मैं जवाब देना चाहता हूं, वो इसलिए कि’ सिनेप्रेमी युवाओं का ढंग हमेशा ही विपरीत रहा है’. जी हां यह बात मैं बड़ी जिम्मेदारी से कह रहा हूं. जब हिन्दी सिनेमा में अमर प्रेम, आराधना, गोलमाल, चुपके – चुपके जैसी शुद्ध पारिवारिक फ़िल्में बन रहीं थीं, दूसरी ओर पार, बाज़ार, चश्मे बद्दूर, अर्धसत्य, सद्गति,…

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स्टार किड्स की जिंदगी का है अनोखा संघर्ष

लेखक : दिलीप कुमार सिनेमा में चकाचैंध की दुनिया लोगों को खूब आकर्षित करती है. जाहिर है! ग्लैमर आदमी को अपनी तरफ खींचता है. वहीँ कोई गरीब बच्चा सामान्य जीवन का ख्वाब देखता है, तो समान्य जीवन के बच्चों में एक कमतरी का भाव होता है, हमेशा से ही सामान्य बच्चों में स्टार किड्स की…

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हृषीकेश दा… सिनेमा का सम्पूर्ण संस्थान

लेखक : दिलीप कुमार सत्यजीत रे को सिनेमा का पूरा संस्थान कहते हैं, तो विमल रॉय को सिनेमा का अध्यापक कहते हैं. वही हृषीकेश दा को उस विद्यालय का स्टूडेंट कह सकते हैं. सत्यजीत, विमल रॉय, हृषीकेश दा आदि का सिनेमा की यात्रा अपने आप में मुक्कमल सिलेबस है. फिल्म निर्देशन की दुनिया में गहराई,…

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अभिषेक बच्चन का सही मूल्यांकन नहीं हुआ!!

लेखक : दिलीप कुमार अभिषेक बच्चन जब शुरू – शुरू में हिन्दी सिनेमा में आए तो यही कहा जाता था, अभिषेक अमिताभ बच्चन का बेटा है, बस इसी शोर में अभिषेक की अदाकारी गुम हो गई थी… कोई ख़ास पहिचान नहीं मिली, हम जैसे न जाने कितने ऐसे दर्शकों को लगता था कि अभिषेक बच्चन,…

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मंच को जीने वाले सच्चे कलाकार… किशोर दा

लेखक : दिलीप कुमार घर में सबसे छोटे किशोर कुमार सभी का बेशुमार प्यार पाते थे, हमेशा खुश रहना उनका स्वभाव था. यहीं से जिन्दादिली आजीवन उनके साथ रही.. आज भारत के सबसे लोकप्रिय गायक के रूप में याद किए जाते हैं. शायद ही कोई पीढ़ी किशोर दा कि सदाबहार आवाज़ से परिचित न हो…

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फिल्मों से समाज को गढ़ने में जुबली कुमार का खास योगदान

लेखक : दिलीप कुमार देश की आज़ादी एवं हिन्दी सिनेमा का एक अंतर्संबंध रहा है. आज़ादी के बाद बंटवारे की त्रासदी के साथ ही उस दौर में जाने कितने कलाकारों ने अपने ख्वाबों को टूटते देखा होगा, तो कईयों ने पलायन, आदि का दर्द झेलते हुए कामयाबी हासिल की है . सिनेमा समाज का दर्पण…

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स्वर्णिम दौर का नायाब सिनेकार… गुरुदत्त

लेखक : दिलीप कुमार गुरुदत्त साहब का नाम जेहन में आते ही  आता है, एक अधूरापन, कुछ टूटा बिखरा हुआ… सिनेमा का वो स्वर्णिम दौर जिसमें गुरुदत्त साहब का अविस्मरणीय योगदान हमेशा याद रहेगा.. कहते हैं प्रतिभा उम्र की पाबंद नहीं होती…गुरुदत्त साहब के लिए यह बात उस दौर में सटीक बैठती थी. फिर चाहे…

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राज किरण की दास्तान : गुमनाम, गुमराह, गुमशुदा हो गया नामचीन कलाकार

लेखक : दिलीप कुमार ये अभिनेता राज किरन हैं, 80 के दशक में लगभग हर बड़ी फिल्म का हिस्सा होते थे..  सहायक हीरो होते हुए भी अपनी आकर्षक पर्सनैलिटी से दर्शकों को आकर्षित करते थे. कला एवं व्यापारिक दोनों तरह की फ़िल्मों में काम करते थे. अर्थ फिल्म में विपत्तियों से घिरी शबाना आज़मी को…

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हिंदी सिनेमा का “जेन्टलमैन” विलेन अमरीश पुरी

लेखक : दिलीप कुमार अमरीश पुरी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली खलनायकों में से एक थे. रुआबदार आवाज़, ऐसी की छोटा मोटा कोई रोल उन्हें जचता ही नहीं था. वो फ़िल्मों में ज्यादातर जमीदार, रॉयल भूमिकाएं ही प्ले करते थे.. हर कोई उन्हें ऐसे ही किरदारों में देखना चाहता था. उनकी विलेन की छवि ऐसी…

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