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ब्रिटेन में अपनी लेखनी से हिन्दी- हिंदुस्तान की लौ जला रहे मधुरेश

मधुरेश मिश्रा की पुस्तक ‘जाने-अनजाने पदचिह्न’ का भव्य लोकार्पण संपन्न

लखनऊ\ हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए एक विशेष और यादगार समारोह का आयोजन उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ के निराला सभागार में हुआ, जिसमें मधुरेश मिश्रा की काव्य पुस्तक ‘जाने-अनजाने पदचिह्न’ का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ.सतीश द्विवेदी(पूर्व बेसिक शिक्षा, राज्य मंत्री , उo प्रo ), विशिष्ट अतिथि श्री नवेंदु मिश्रा (सासंद, हाउस ऑफ़ कॉमन्स , ब्रिटिश संसद), प्रमुख अतिथि आई०ए०एस० श्री जितेंद्र कुमार(अपर मुख्य सचिव भाषा, उ० प्र०),  संचालक  पंकज प्रसून (कवि एवं व्यंग्य-लेखक ) और रचनाकार श्री मधुरेश मिश्रा के द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ, आचार्य  बलराम मिश्र द्वारा मंत्रोच्चारण और स्वागत श्लोक से किया गया।

मधुरेश जी ने पुस्तक लिखने की प्रेरणा के संदर्भ में अपने बचपन की यादों, संघर्षों, और  वर्तमान कार्यक्षेत्र तक की यात्रा का उल्लेख किया। उन्होंने जीवन के पथ पर आगे बढ़ने के लिए संघर्ष, त्याग, बलिदान और परिस्थितियों के अनुकूल सामंजस्य को महत्वपूर्ण बताया। मिश्रा जी ने अपनी चुनिंदा कविताओं का सजीव पाठ कर श्रोताओं को सम्मोहित कर दिया।

मुख्य अतिथि डॉ. सतीश द्विवेदी ने मधुरेश मिश्रा की   एक अलग कार्यक्षेत्र में रहते हुए भी,  हिन्दी काव्य पुस्तक लिखने के लिए सराहना की। उन्होंने सरल भाषा में लिखी गई कविताओं की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि यह पुस्तक भारतीय संस्कृति और देशभक्ति की भावना को गहराई से दर्शाती है।

विशिष्ट अतिथि नवेंदु मिश्रा ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए मधुरेश मिश्रा के योगदान की सराहना की। उन्होंने ब्रिटेन में भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए मिश्रा जी द्वारा किए गए प्रयासों का भी उल्लेख किया।

प्रमुख अतिथि जितेंद्र कुमार ने कविताओं की भाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि गाँव और देशप्रेम पर लिखी गई ये कविताएँ केवल वही व्यक्ति लिख सकता है जिसने ऐसे जीवन जिया हो।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि पंकज प्रसून ने कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के विकास और उसकी गतिविधियों की सराहना की। उन्होंने काव्य पुस्तक ‘जाने-अनजाने पदचिह्न’ से कई कविताओं के अंश पढ़े और कहा कि इस पुस्तक में जटिल विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने की कला को बखूबी देखा जा सकता है। प्रधान संपादक डॉ. अमिता दुबे ने धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान अतिथियों और लेखक के प्रति आभार व्यक्त किया।

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