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काशी- अयोध्या के दर्शन के साथ बीजेपी के मुख्यमंत्रियों को चुनावी कमान

एक दर्जन मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री तीन दिन तक काशी-अयोध्या में।  

आनन्द अग्निहोत्री

काशी में विश्वनाथ कॉरीडोर लोकार्पण समारोह अपने आप में अद्भुत रहा। इसका जो संदेश देश-दुनिया में जाना था वह तो गया ही लेकिन समारोह के साये तले जिस तरह सियासी कवायद हुई इसके पीछे जरूर कुछ न कुछ और है जो अभी परदे के सामने नहीं आ रहा है। यह ठीक है कि कार्यक्रम के केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे लेकिन सभी भाजपाई राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा उप मुख्यमंत्रियों का काशी समारोह में पहुंचना अनायास नहीं था। यह प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में अपनी उपस्थिति दर्शाने की ललक मात्र नहीं थी। गंगा नदी का नौका विहार क्या रंग लाता है, समय बतायेगा।

अगर मुख्यमंत्रियों, उप मुख्यमंत्रियों की सिर्फ मुंह दिखाई होती तो समारोह के बाद सभी भाजपाई मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्यों को रवाना हो जाते। इसके विपरीत सभी मुख्यमंत्री बुधवार को अयोध्या पहुंच रहे हैं। कहने को सभी रामलला के दर्शन और हनुमान गढ़ी में पूजन करेंगे, लेकिन इस जमावड़े का मकसद सिर्फ दर्शन और पूजन तो नहीं लगता। इन सभी मुख्यमंत्रियों का तीन-तीन दिन उत्तर प्रदेश में रहना सामान्य बात नहीं है। इसके पहले तो कभी ऐसा कुछ हुआ नहीं। निश्चित रूप से इसके पीछे केन्द्र की मोदी सरकार के साथ-साथ प्रदेश की योगी सरकार का कुछ न कुछ मंतव्य भी है।

भाजपाई राज्यों के मुख्यमंत्री धार्मिक समारोह में काशी पहुंचते हैं। वहीं प्रधानमंत्री मोदी 12 घंटे के भीतर एक नहीं, दो-दो बार इन सभी मुख्यमंत्री के साथ बैठक करते हैं, नसीहतें देते हैं। सवाल यह है कि ये नसीहतें क्यों दी गयीं। जो भी बातें छनकर आयीं उनके मुताबिक प्रधानमंत्री ने अपनी हिदायतों में विकास को केन्द्र में रखा। इन बैठकों का मूल मंतव्य क्या था, यह फिलहाल सामने नहीं आया है। सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है। यह तो सभी जानते हैं कि अगले साल पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा की विधान सभाओं के चुनाव होने हैं। इन सबमें भी प्रमुख है उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव क्योंकि माना यही जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी अपना अगला मोर्चा सुगम बनाने के लिए ज्यादा ध्यान उत्तर प्रदेश पर फोकस कर रहे हैं।

और करें भी क्यों नहीं, उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक संसदीय सीटें हैं। अगर अगले साल के विधान सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार महफूज रहती है तो वर्ष 2024 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी की डगर आसान हो जायेगी। साफ है कि उनका पहला ध्यान उत्तर प्रदेश में भाजपा को सत्ता में बरकरार रखना है। यही कारण है कि काशी विश्वनाथ लोकार्पण समारोह में उत्तर प्रदेश के अलावा हरियाणा, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, मणिपुर और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री पहुंचे। सभी मुख्यमंत्री अपनी इच्छा से समारोह में पहुंचे हों, ऐसा तो नहीं लगता। परदे के पीछे जरूर कहीं न कहीं उनसे इस बारे में कहा गया होगा। प्रधानमंत्री अलकनंदा क्रूज में दो बार मीटिंग कर डिनर भी उसी में करते हैं। रात बारह बजे मीटिंग खत्म कर काशी का विकास देखने निकलते हैं। इससे उन मुख्यमंत्रियों पर भी दबाव पड़ा है जो विकास कार्यों का औचक निरीक्षण करने की जहमत नहीं उठाते।

सियासी गलियारों की चर्चाओं पर ध्यान दें तो लगता है कि विकास की बात तो आवरण है, सभी मुख्यमंत्रियों की उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में चुनावी भूमिका तय की गयी है। बैठक में सम्भवत: उन्हें बताया गया है कि चुनावों में उन्हें क्या भूमिका निभानी है। किसके जिम्मे क्या कार्य है और उसे कैसे इसे कार्यरूप में परिणत करना है, इन सब बातों में मुख्यमंत्रियों को अवगत कराया गया है। आपको बता दें कि भाजपा से पहले यह फार्मूला कांग्रेस आजमा चुकी है। उसने छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को ऐसी ही जिम्मेदारी सौंपी है। सम्भवत: इसी रणनीति के तहत भाजपाई मुख्यमंत्री अयोध्या पहुंच रहे हैं। रामनगरी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ बैठक कर ये सभी अपने दायित्वों के प्रति सामंजस्य बैठा सकते हैं। हालांकि बाह्य तौर पर भाजपा का कोई भी वरिष्ठ पदाधिकारी इस बारे में कुछ भी कहने से कतरा रहा है, लेकिन सुविज्ञ सूत्र यही कहानी कह रहे हैं।

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