
डॉ शिल्पी शुक्ला
मानव का प्रकृति ने अटूट नाता है। मनुष्य प्रकृति की गोद में जितना सुरक्षित है उतना सुरक्षित और प्रसन्न वह कहीं भी नहीं रह सकता। हवा से झूमते हुए पेड़, कल-कल कर बहती हुई नदी , पक्षियों का कलरव और मिट्टी की सोंधी खुशबू। मनुष्य को हमेशा से ही प्रिय रही है। यह बात अलग है कि जैसे-जैसे हम विकास की सीढि़यां चढ़ते गए हम प्राकृतिक परिवेश से दूर होते गए। हमारे जीवन का अभिन्न अंग हमारी ग्रामीण संस्कृति एवं जीवन शैली सेहम एक प्रकार से कट चुके हैं। शहरी जीवन की आपाधापी से बचने के लिए अभी भी कुछ लोग सौभाग्यशाली हैं जो गांव की धरती पर अपने पांव रख पाते हैं। विकास कभी भी बुरा नहीं है परंतु आवश्यकता है विकास के साथ ही साथ अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता एवं अपनी परंपराओं से जुड़े रहने की । कहीं ऐसा न हो की विकास की अंधी दौड़ में हम अपने आप को पूरी तरह से भूल जाएं। यदि हम आपाधापी भरी जि़दगी में कुछ सुकून के क्षण पाना चाहते हैं तो हमें प्रकृति के सान्निध्य में ही जाना होगा।
भारत वर्ष विविधताओं का देश है। हमारे देश की विविधताओं को पूरी तरह से जानना लगभग नामुमकिन है। यहां अनेक जातियो- जनजातियों, धर्मों और समुदायों के लोग रहते हैं। जिनकी अलग-अलग सांस्कृतिक विशेषताएं हैं। हमारे देश के जनजातीय समूह अपनी संस्कृति को आज भी सुरक्षित रख रहे हैं। मध्यप्रदेशकी राजधानी भोपाल के श्यामला हिल्स में स्थित ‘जनजातीय संग्रहालय’ अपने आप में विशिष्ट है। इसकी स्थापना 2013 में की गई। संग्रहालय का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणवराय जी के कर कमलों द्वारा हुआ। जनजातीय संग्रहालय का आर्किटेक्ट विश्ष्टि है। इसकी डिज़ाइनिंग श्री रेवती काथ द्वारा की गई है। अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन 2022 में शामिल होने जाने पर इसे देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। मैंने जो देखा मेरे लिए वह अकल्पनीय था। जनजातीय संग्रहालय 06 दीर्घाओं में विभाजित है और राज्य की 07 प्रमुख जनजातियों की जीवनशैली और परंपराओं को दर्शाता है। यह संग्रहालय परस्पर दो भिन्न जीवनशैलियों का परिचय एक-दूसरे से करवाता है।


आदिवासी जीवन के विविध पक्षों को समझने और उसे उसी रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य को सामने रख कर जनजातीय संग्रहालय की स्थापना की गई। यहां प्रवेश करते ही आप स्वयं को एक दूसरी दुनिया में पाएंगें जहां जनजातीय समाज के जीवन से संबंधित सभी वस्तुएं हैं, उनकी जीवनशैली, आस्थाओं, विश्वासों की जानकारी यहां मिलती है। यहां मनुष्य और प्रकृति के आदिम संबंधों का संगीत हर ओर गुंजायमान है। इस संग्रहालय में गोंड, भील, कोरकू, बैगा, कोल, भरिया, सहरिया आदिवासी जनजातियों के जनजीवन को कलात्मकता से उभारा गया है। जनजातियों के आवास और रहन-सहन की सभी वस्तुएं एवं उनके विश्वास, वास्तुगत विशेषताओं के साथ ही शिल्पगत विशेषताओं को लिए बरबस ही आने वालों को अपने से बांध लेते हैं।
गोंड व भील समुदाय के चित्रकारों के चित्रों की प्रदर्शनी सह विक्रय दीर्घा में ‘ लिखंदरा’ शैली में बने चित्रों को डिस्प्ले किया गया है। मनुष्य के साथ प्रकृति के आत्मीय संबंधों और परंपराओं को चित्रित करने वाली पेंटिंग्स में चटक रंगों का प्रयोग किया जाता है जो दर्शकों का ध्यान सहसा ही अपनी ओर खींच लेता है। ‘लिखन्दरा जहाँ एक ओर लिखने के अर्थ को व्यक्त करता है ,वहीं यह शब्द बहुत ज्यादा लिखने वाले के लिए भी लोक में प्रयुक्त किया जाता है। मध्यप्रदेश की सबसे कलाप्रिय जनजाति ‘भील’ के आनुष्ठानिक कथाचित्र ‘पिठौरा’ को चित्रांकित करने वाले कलाकार को लिखन्दरा या लखिन्दरा कहा जाता है। जनजातीय संग्रहालय की एक दीर्घा को ही चित्र एवं शब्द के समेकित अभिव्यक्ति केन्द्र के रूप में कल्पित किया गया है, जिसमें प्रतिमाह जनजातीय चित्रकारों के चित्र श्लाका प्रदर्शनी के अंतर्गत प्रदर्शित किए जाते हैं।’ संग्रहालय की दीर्घा के ब्रोशर से साभार
जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय जीवन को सम्यक रूप से प्रस्तुत किया गया है। जीवन के विविध पक्षों को विभिन्न दीर्घाओं में विभाजित किया गया है। संग्रहालय में 06 दीर्घाएं है-
सांस्कृतिक वैविध्य – इसमें विभिन्न आदिवासी समुदायों की संस्कृति को सहेजा गया है। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण है । संग्रहालय में मध्यप्रदेश के पहाड़, पठार, जंगल को जीवंत किया गया है। इसमें मध्यप्रदेश की वटवृक्षीय संस्कृति मुखर है। यहां जाकर हम एक अलग दुनिया में पहुंच जाते हैं। प्राकृतिक उपादानों के कुशलतम उपयोग पर पनपती बेमिसाल जि़न्दगी और आदिवासी जीवन से जुड़ी लगभग सभी वस्तुओं को यहॉं बखूबी प्रदर्शित किया गया है। प्रकृति में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग आदिवासी समुदाय जिस सुंदरता से करते हैं वह हमें दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर देती है। उनका शिल्पगत कौशल हमेशा के लिए हमारे मन मस्तिष्क में अंकित हो जाता है।
जीवन शैली दीर्घा में गोंड जनजाति के रहन सहन के तरीके,उनके उपयोग की सामग्री, लिपे –पुते आंगन के साथ सुंदर घर, अनाज संग्रहण की वस्तुएं आदि दर्शाई गईं हैं। गोंड शैली में बने और सजे घरों के नमूने यहां दीर्घा को जीवंतता प्रदान कर रहे हैं। गोंड घरों में बनी गौशाला, अनाज संग्रहण के नमूने, झोंपड़ी में बने चूल्हें सब कुछ मानों यहॉं सजीव हो उठा हो। प्रकाश संयोजन ने ग्रामीण वातावरण को ओर भी अधिक प्रभावी बना दिया है।
कला बोध दीर्घा में गीत, पर्व, मिथकों और अनुष्ठानों को समेटा गया है। गोंड महिलाओं द्वारा जिस प्रकार अपने घर को मिट्टी एवं प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है वह अपने आप में अद्वितीय है। जनजातियों के जीवन में व्याप्त संगीत भी यहॉं वाद्ययंत्रों के माध्यम से मुखरित हुआ है। राजमर्रा के जीवन में प्रयोग होने वाली वस्तुओं की कलात्मकता देखते ही बनती है।
देव लोक दीर्घा में संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से देवलोक को जीवंतता दी गई है। देवलोक की कल्पना को साकार करने के लिए यहां कोई मंदिर नहीं बनाया गया है, प्रकृति के समस्त सोपान ही अनादि काल से जनजातियों के लिए देवतुल्य रहे हैं । यहां आदिवासी समुदायों के धार्मिक विश्वासों को सांकेतिक रूप से अभिव्यक्त किया गया है यहां घने जंगल, तालाब, घने पेड़ों से बाहर झांकता चांद, टेढी मेडी गलियां सभी कुछ है। देवता को चढ़ाई गई असंख्य भेंट, भटकती प्रेतात्माएं, रक्षक देवता प्रकाश संयोजन से वास्तविकता का बोध कराता है। प्रकृति की गोद में निवास करने वाली जनजातियों के लिए प्रकृति के सभी घटक ही देवतुल्य हैं। पेड़-पौधे, सूरज-चन्द्रमा, आकाश, जलस्रोत आदि ही उनके देवता हैं जो बीमारियों से उनकी रक्षा करते हैं, फसलों को हरा-भरा रखते हैं, जीवन-मृत्यु का चक्र इन्हीं के द्वारा नियंत्रित है। इन्हें यहां उसी रूप में अभिव्यक्त किया गया है, जिस रूप में ये जातियों के जीवन में व्याप्त हैं। इसे यहां सिर्फ देखा ही नहीं वरन अनुभव किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ दीर्घा में जनजाति बहुल राज्य छत्तीसगढ़ की विभिन्न जनजातियों के जीवन की झांकी प्रस्तुत की गयी है। रजवार घरों में बाँस-मिट्टी की जालियों और लिपाई का तरीका अत्यंत विशिष्ट है और इसे न केवल अपने समुदाय बल्कि अपने राज्य की पहचान बन जाने का दर्जा प्राप्त है। इसे उसी रूप से यहां बनाया गया है। बस्तर में दश्हरे के समय बनने वाले दश्हरा रथ की निर्माण प्रक्रिया को यहां सहेजा गया है। रक्कु दीर्घा में बचपन और खेल खिलौने संकलित है । इन सभी दीर्घाओं को केवल सामने से ही नहीं बल्कि ऊपर से देखने की भी व्यवस्था है,जिससे जनजातीय जीवन का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। संग्रहालय का प्रतीक चिहृन ‘बिरछा’ है। यह वृक्ष उवर्रा शक्ति और जीवंतता का प्रतीक है। आदिवासी महिलाएं इसे अपने शरीर पर परिवार की सुख समृद्धि के लिए धारण करतीं हैं। जीवन के सभी पक्षों को उनकी पूर्णता के साथ यहॉं उजागर किया गया है। जनजातीय जनजीवन को निकटता से देखने और समझने का अवसर शहरवासियों को आदिवासी संग्रहालय में मिलता है। जहां मिट्टी की सोंधी खुशबू हर ओर व्याप्त है। आधुनिक तकनीकों के प्रयोग से आदिवासी जीवन यहां जीवंत हो उठा है। कुल मिला कर यह एक ऐसी जगह है जिसकी शायद हमने कभी कल्पना नहीं की होगी जो कि अपने आप में अनूठी और बेहद सुकूनदायक है।