Thursday, April 3, 2025
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शातिर है PFI, वकील, प्रोफेसर और बड़े कारोबारी भी शामिल

मुस्लिम धर्मगुरुओं की रजामंदी के बाद लगी पीएफआई पर पाबंदी

आनन्द अग्निहोत्री

सुन्नी वहाबी संगठन पीएफआई और उसके आठ सहयोगी संगठनों पर केन्द्र सरकार ने पांच साल के लिए बैन लगा दिया। बड़ी बात यह कि पीएफआई ने इसे स्वीकार भी कर लिया और अपने संगठन को भंग करने का ऐलान किया है। सब कुछ शांति के साथ निपट गया। जिस तरह 22 और 27 सितम्बर को देश भर में पीएफआई के ठिकानों पर एनआईए और ईडी छापे मार रहीं थीं, इनके कार्यकर्ताओं की धरपकड़ कर रहीं थीं, उससे पहले ही अनुमान हो गया था कि सरकार कभी भी इन पर प्रतिबंध लगा सकती है। यह सब अचानक नहीं हुआ है। इसकी शुरुआत तो एक साल से चल रही थी। छापों के दो दौर में जब सरकार के पास सुबूत पुख्ता हो गये तो उसने प्रतिबंध लगा दिया। बैन लगाने का फैसला भी केन्द्र सरकार ने अचानक नहीं लिया है। चूंकि मामला मुस्लिम समुदाय से जुड़ा हुआ था, इसलिए सरकार ने कोई भी सख्त कदम उठाने के पहले देवबंदी, बरेलवी और सूफी सम्प्रदाय के वरिष्ठों के साथ सलाह मशविरा किया। उनकी ओर से सहमति मिलने के बाद ही यह कदम उठाया गया।

केन्द्र सरकार की जांच एजेंसियां करीब एक साल से पीएफआई की टॉप लीडरशिप में शामिल 45 लोगों पर अनवरत नजर रख रहीं थीं। इनमें से ज्यादातर संगठन के फाउंडर मेंबर थे। इनमें वकील, प्रोफेसर और कारोबारी शामिल हैं। संगठन का चेयरमैन ओएमए सलाम इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड का सस्पेंड कर्मचारी है, जबकि उपाध्यक्ष ईएम अब्दुल रहमान बिजनेसमैन, पी कोया गवर्नमेंट कॉलेज में लेक्चरर और खालिद मोहम्मद एडवोकेट है। छापेमारी में सबसे पहले इन्हीं को गिरफ्तार किया गया। पीएफआई में ज्यादातर लोग पहले स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से जुड़े थे। सरकार ने 2001 में सिमी को आतंकवादी संगठन घोषित कर बैन लगा दिया था। इस बार प्रतिबंध से पहले जांच एजेंसियों ने पीएफआई के पदाधिकारियों और बड़े कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसा।

इस बात का अंदाज तो पहले से ही था कि कांग्रेस और गैरभाजपाई दल सरकार के इस कदम का विरोध करेंगे। ऐसा ही हुआ भी। ये दल तत्काल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को फिरकापरस्त ठहराकर इस पर बैन लगाने की मांग करने लगे। लेकिन यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की कि सरकार ने इतना बड़ा कदम कैसे उठाया। गिरफ्तारियों और सुबूतों की बात छोड़ दीजिये, इन्हें तो सही और गलत ठहराया जाता रहेगा। इस तरह के आरोप भी लगेंगे कि सरकारी सुबूत मनगढ़ंत हैं। सच तो यह है कि इस प्रतिबंध के पीछे भी मुस्लिम धर्मगुरुओं की सहमति है। अखिल भारतीय सूफी सज्जादानशीन परिषद ने केन्द्र सरकार को विचार विमर्श में इस बात की सहमति दी थी कि अगर यह संगठन देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त है तो इस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। इसी तरह अजमेर दरगार के आध्यात्मिक प्रमुख जैनुल आबेदीन अली खान ने भी सरकार से कहा था कि पीएफआई भारत में साम्प्रदायकिता के हालात का फायदा उठाकर अखिल इस्लामी संगठनों के वहाबी-सलाफी एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है। जब ये इस्लाम धर्म प्रमुख सरकार के पाले में आ गये तब बैन करने का फैसला लिया गया।

विपक्षा कह रहा है बैन कोई समाधान नहीं है। वह आरएसएस पर बैन लगाने की मांग तो कर रहा है लेकिन यह नहीं बता रहा कि अगर बैन समाधान नहीं तो फिर समाधान क्या है। वह आरोप लगाने के पहले अपने गिरेबां में झांक कर नहीं देखता कि स्वयं उसकी अपनी गतिविधियां क्या हैं। मतदाताओं ने क्यों भाजपा को दूसरी-तीसरी बार सत्ता सौंपी है। ऐसा नहीं है कि आरएसएस पर बैन न लगा हो। आजादी के बाद तीन बार संघ पर बैन लगाया जा चुका है। इसके पीछे तर्क वहीं दिये गये थे, जो आज विपक्षी दल दे रहे हैं। लेकिन आज तक कोई भी दल संघ पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप नहीं लगा सका। अगर ऐसा कुछ होता, तब तो आरोप लगता। यह जरूर है कि उस पर हिन्दू मानसिकता का प्रचार प्रसार करने का आरोप लगता रहा है। संघ की भी विदेशों में शाखाएं हैं, पीएफआई की जड़ें भी कई इस्लामी मुल्कों में फैली हुई हैं। लेकिन विदेश में भी संघ की किसी शाखा पर भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप नहीं लगा है।

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