
आनन्द अग्निहोत्री
कोयले की कमी से घटता विद्युत उत्पादन संकट का सबब बनता जा रहा है। अब बिजली की जरूरत तो आम आदमी से लेकर उद्योग जगत तक सभी को है। जब किल्लत होगी तो इसके खिलाफ आवाज भी उठेगी। जाहिर है सरकार कोयले का इंतजाम करेगी ही ताकि बिजली पहले की तरह तैयार हो और बिजली कटौती न करनी पड़े। यह तो सामान्य बात है। इसका एक पक्ष यह भी है कि संकट से कोयले का विदेश से आयात करने की तैयारी की जा रही है। अगर ऐसा होता है तो यह पहली बार नहीं होगा। इसके पहले भी विभिन्न सरकारों में संकट दिखाकर विदेशों से सामान आयात कर खेल किया गया है। कहीं यह नये तरीके से पुरानी चाल तो नहीं चली जा रही है। अगर ऐसा होता है और कोयले का आयात किया जाता है तो जो बिजली बनेगी वह महंगी होगी और इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना होगा।
कोल इंडिया का कहना है उसने पिछले वर्ष की इस अवधि की तुलना में इस बार तापीय विद्युत संयंत्रों को कोयले की 14 प्रतिशत आपूर्ति अधिक की है। तापीय विद्युत संयंत्र कोयले की कमी का रोना रो रहे हैं। विद्युत उत्पादन घटा रहे हैं। संयंत्रों से कोयले के बारे में मिले आंकड़े भी बताते हैं कि उनके पास कोयले की कमी है। सवाल यह है कि झूठ कौन बोल रहा है। कोल इंडिया का कहना है कि गत वर्ष की तुलना में इस बार बिजली की मांग बढ़ी है। प्रश्न मांग बढ़ने या घटने का नहीं, विद्युत उत्पादन का है। कोल इंडिया बिजली की मांग बढ़ने के पीछे जो तर्क दे रहा है उन्हें माना जा सकता है। उसका तर्क है कि महामारी के बाद आर्थिक गतिविधियां बढ़ने से और तापमान सामान्य से अधिक होने के कारण बिजली की मांग बढ़ गयी है। इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है। ऐसा हो सकता है, लेकिन विद्युत उत्पादन के आंकड़े बता रहे हैं कि कम बिजली बन पा रही है। सवाल उठता है क्यों, जवाब है कोयले की कमी। विद्युत संयंत्रों के आंकड़े साफ हैं कि कोयले की कमी है। कहीं न कहीं कुछ तो झोल है जो साफ नहीं हो पा रहा है।
अनपरा विद्युत संयंत्र को सोमवार को 30 हजार, ओबरा को 10 हजार 200, हरदुआगंज को 19 हजार और पारीछा को 15 हजार 145 मीट्रिक टन कोयला मिला जबकि क्रमश: इन्हें 40 हजार, 12 हजार 500, 19 हजार और 15 हजार 500 मीट्रिक टन कोयले की जरूरत थी। हरदुआगंज की यूनिट-7 रात सवा नौ बजे से सुबह 4.22 बजे तक बंद रही। इसके कारण हरदुआगंज में 2.280, पारीछा में 2.104 यानि कुल मिलाकर 4.384 मेगा यूनिट बिजली के उत्पादन में कमी आयी। आंकड़े बताते हैं कि वास्तव में तापीय विद्युत संयंत्रों के समक्ष कोयले का गम्भीर संकट है। इसे दूर करने के दो उपाय हैं। पहला यह कि देश में कोयला उत्पादन बढ़े और दूसरा यह कि विदेश से आयात किया जाये। जहां तक उत्पादन बढ़ाने की बात है, इसकी एक सीमी है। दूसरा विकल्प ही शेष बचता है। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमतें चढ़ी हुई हैं और जल्द इनके नीचे आने की सम्भावना नहीं है। ऐसे में कोयला आयात करना फायदे का सौदा नहीं माना जा सकता। इसका विरोध भी शुरू हो गया है।
उप्र राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने कोयला आयात करने का विरोध शुरू कर दिया है। परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने इसके खिलाफ नियामक आयोग में प्रत्यावेदन दाखिल किया है। अगर विदेश से कोयला खरीदा जाता है तो इससे बिजली महंगी होगी। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। उनका दावा है कि उत्पादन निगम भी विदेशी कोयला खरीदने के लिए शॉर्ट टर्म टेंडर निकालने की तैयारी में है। कोयला मंत्री ने संसद के अंदर कहा था कि देश में कोयले की कमी नहीं है। ऐसे में अब पावर प्लांट को डिमांड के अनुसार कोयला न मिलने की बात समझ से परे है। आशंका जतायी जा रही है कि यह काम केवल कुछ निजी घरानों को फायदा देने के लिए किया जा रहा है।
अक्टूबर 2021 में जब कोयले की कमी आई थी तो ऐसे ही निजी घरानों ने एनर्जी एक्सचेंज पर 19 से 20 रुपए प्रति यूनिट तक बिजली बेची थी। अब कोयले में भी यही खेल किया जा रहा है। उस समय भी विदेश से कोयला आयात किया गया था। जानकारी के मुताबिक 1700 रुपए प्रति टन वाला कोयला 17000 रुपए टन मंगवाने की तैयारी है। कोल इंडिया ने सभी बिजली उत्पादन इकाइयों से फ्यूल एग्रीमेंट किया है। ऐसे में कोयला उपलब्ध कराना कोल इंडिया की जिम्मेदारी है। बिजली पैदा करने में कोयला सबसे बड़ा रॉ मैटीरियल है। बिजली बनाने की लागत में कोयले का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है। अगर 10 प्रतिशत भी इंपोर्टेड कोल का इस्तेमाल होता है, तो बिजली महंगी होनी तय है। उत्तर प्रदेश के उत्पादन निगम के पावर प्लांट में कोल इंडिया के कोयले का इस्तेमाल होता है। किसी में भी इंपोर्टेड कोल का इस्तेमाल नहीं होता है।