पुस्तकालय : प्रेमचन्द की कहानी "कफन" की समीक्षा
लेखक : तुलसीराम "राजस्थानी"
साहित्य जगत में मुंशी प्रेमचंद का नाम एक महान कथाकार के रूप में बड़े ही आदर से लिया जाता है। उनकी कहानियां तात्कालिक सामाजिक व्यवस्थाओं पर आधारित हैं। उन्होंने उस समय समाज में विद्यमान रूढ़िवादी परम्पराओं, विषमताओं, अंधविश्वासों व मानसिक-दैहिक उत्पीड़न को बड़ी सरलता से अभिव्यक्त किया है। उनके द्वारा लिखित कहानी "कफन" भी यथार्थवाद पर आधारित है। इस कहानी में परिवार का मुखिया घीसू, उसका पुत्र माधव व पुत्रवधु बुधिया, ये तीन प्रमुख पात्र हैं। घीसू व माधव दौनों एक नंबर के आलसी व कामचोर हैं। हालांकि गांव में खेती का खूब काम-धंधा है, लेकिन दौनों इतने निकम्मे हैं कि एक दिन काम पर जाते हैं, तो कई दिन तक निठल्ले बैठे खाते हैं। बेचारी बुधिया ही यहां-वहां मजदूरी करके घर का काम चलाती है।
कहानी में गर्भवती बुधिया प्रसव-वेदना में तड़प रही होती है। उसका ससुर व पति उसकी पीड़ा को दूर करने का उपाय करने की बजाय झोंपड़ी के बाहर बैठकर किसी के खेत से चुरा कर लाए हुए आलू भूनकर खा रहे होते हैं। असहनीय पीड़ा से बेचारी बुधिया की अकाल-मृत्यु हो जाती है। पिता-पुत्र गांववालों के समक्ष दिखावटी रोना रोते है, जिसपर गांववाले उन्हें सांत्वना देते हैं। लकड़ी व कफन की व्यवस्था के लिए घर में फूटी कौड़ी भी नहीं होने से दौनों जमींदार के पास जाकर मदद की गुहार लगाते हैं। जमींदार उनकी खराब आदतों से पहले ही वाकिफ होते हुए भी उनकी दीनता को देखकर उनके सामने दो रुपए फेंक देता है। कुछ चन्दा गांववाले भी करते हैं जिससे उनके पास पांच रुपए इकट्ठा हो जाते हैं। दौनों बाप-बेटे कफन खरीदने के लिए बाजार जाते हैं। लेकिन सस्ता कफन खरीदने के चक्कर में घूमते-फिरते हुए एक मधुशाला में पहुंच जाते हैं, जहां से एक शराब की बोतल व पास की दुकान से खाना खरीदते हैं। उधर घर पर बुधिया की लाश पड़ी है, इधर ये दौनों बेफिक्र होकर बड़े चाव से खूब खाते-पीते हैं और मौजमस्ती करते हुए वहीं पर बेसुध होकर पड़ जाते हैं।
"कफन" कहानी दिल को झकझोर देने वाली है। आज भी हमारे आस-पास घीसू व माधव जैसे पाषाण-हृदय के लोग मिल ही जाएंगे, जिनकी संवेदनाओं को मृत्यु भी नहीं पिघला सकती है। हमारे हिन्दू धर्म में कफन एक परम्परा का प्रतीक है, जिसे मृत इंसान को ओढ़ाकर उसका ससम्मान अंतिम संस्कार किया जाता है। लेकिन परिवार के लिए सबकुछ त्याग करने वाली बुधिया को अंत समय में कफन भी नसीब नहीं हो पाता है। कहानी में घीसू व माधव को पेट की भूख इतना अंधा बना देती है कि कफन के लिए एकत्रित पैसे भी वे शराब और स्वादिष्ट खाने में उड़ा देते हैं। इस कहानी में प्रेमचंद द्वारा समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता, मजदूर वर्ग की पीड़ा व इंसान के चारित्रिक पतन का बड़ी सहजता से सटीक चित्रण किया है।